February 15, 2012

जैसो बंधन प्रेम कौ, तैसो बंध न और


प्रेम का अर्थ है किसी अस्तित्व को इस कदर टूटकर चाहना कि उसके अस्तित्व में ही अपनी हर ख्वाहिश का रंग घुलता हुआ महसूस हो। यही प्रेम है जो रामकृष्ण ने मां शारदामणि से किया, यही वह प्रेम है जिसने राधा-कृष्ण को विवाह बंधन में न बंधने के बाद पूज्य बना दिया। प्रेम परमेश्वर का रूप है, एक समर्पण है, यहां आकर्षण का लेशमात्र भी नहीं। जीवन में प्रेम आते ही आत्मीयता, सहकारिता और सेवा की उमंगें खुद-ब-खुद हिलोंरे मारने लगती है। जैसे-जैसे प्रेम पवित्र होता है, वैसे-वैसे प्रेमी अपने प्रियतम (आराध्य) के हृदय में समाता चला जाता है, तभी तो मीरा, सूर, कबीर जैसे प्रेमियों का जन्म होता है। सच्ची श्रद्धा की परिणति है प्रेम और यह पवित्रता से पूर्ण होता है।
प्रेम की खुशबू से वातावरण महक रहा है। प्रकृति का कण-कण प्रेमासिक्त हो अपने देवता के चरणवंदन कर रहा है। इसी बीच वेलेंटाइन डेका आना मानो ऐसा लगता है कि यह सब सदियों से निर्धारित रहा होगा। लेकिन वेलेंटाइन डेका इतिहास तो ज्यादा पुराना नहीं है! हां परंतु इस दिन के साथ जुड़ा शब्द प्रेमसृष्टि की उत्‍पत्‍ति के साथ ही उत्पन्न हुआ और इसके खात्मे पर ही अलविदा होगा। यही वह शब्द है जिसके सहारे प्रेमी, परमात्मा को प्रकृति के कण-कण में महसूस करने लगता है। उसे कुछ भी पराया नहीं लगता, वह बन जाता है सम्पूर्ण विश्व का मित्र। सबका दुःख दर्द उसे अपना लगने लगता है।
परंतु बदलते वक्त ने जीने के मायने बदल दिए। ऐसे में सोच, संबंध और मूल्यों का बदलना तो जायज़ ही था। अब इस बदलते दौर में प्रेम भी कैसे अछूता रहता। बदल गया मन की वीणा का राग। कहानी, कविताओं, उपन्यासों और पुरानी फिल्मों में देखा गया प्रेम गुजरे जमाने की बात हो गया। प्रेम अब भावना नहीं रहा। वैश्वीकरण की संस्कृति ने प्रेमको हृदय से निकालकर चैाराहे पर ला पटका और प्रेम गमले में उगने वाले उस पौधे सा गया, जिसे गिफ्टस, डेटिंग, कामना और वासना के पानी से प्रतिपल सींचना पड़ता है। नहीं तो वह मुरझा जाएगा। खो गई प्रेम की गहराई और इसकी गरिमा। प्रेम की पवित्रता का लोप हो गया और यह बन गया सिर्फ एक वेलेंटाइन डेको सफल बनाने का जरिया। वर्तमान की तेज दौड़ने वाली जि़दगी में प्रेम की दुकानें सजने लगी। जहां प्रेमोपहारों के नाम पर लोगों को ठगा जाने लगा। धीरे-धीरे प्रेम मशीनी हो चला। जिन मानवीय संबंधों की दुहाई देते हम थकते से नहीं थे। उन एहसासों के स्तर पर हमने सोचना बंद कर दिया। प्रेम में सर्वस्व अर्पण करने की परंपरा विलुप्त होने लगी और प्रेम लड़ने लगा अपना अस्तित्व बचाने के लिए। प्रेम आकर्षण से आकर देह पर टिक गया है और सामने आया प्रेम का विकृत रूप। प्रेम फैशन बन गया। इसी कारण वेलेंटाइन डेके दिन हजारों ऐसी खबरें सुर्खियां बनती हैं जो हमें सोचने को मजबूर करती हैं कि हम किस दलदल में फंसते चले जा रहे। बाजारीकरण के युग में प्रेम भी बाजारू हो चला है। प्रेम के लिए ऐसा कहना शर्मनाक है लेकिन यर्थाथता यही है। एलिजाबेथ बैरेट ब्राउनिंग अपने प्रेमी को एक पत्र में लिखती हैं- अगर मुझे तुम प्यार करना चाहते हो तो सिर्फ प्यार करो, किसी और चीज के लिए नहीं। यह मत कहो कि...मैं उसकी मुस्कराहट को प्यार करता हूं...उसके रूप को...उसके बोलने के नर्म अंदाज को, क्योंकि ये विचार किसी खास दिन मेरे विचारों के साथ बड़ी खूबी से समन्वित हो उस दिन को खूबसूरत बना सकते हैं-लेकिन मेरी जान ये सब चीजें बदल भी सकती हैं और प्रेम को नष्ट भी कर सकती हैं या नहीं भी। ब्राउनिंग का यह कहना सर्वथा उचित है क्योंकि दैहिक प्रेम को कब तक जिया जा सकता है। ऐसा प्रेम देह की सुंदरता समाप्त होते ही समाप्त हो जाएगा। काश! ये बदले जमाने का प्रेम धरती पर उगने वाला वटवृक्ष बन, पाताल तक अपनी जडे़ं पहुंचा पाता और जन्म-जन्मांतरों तक अटल-निश्चल इस धरा की शोभा बढ़ता।
आज के इस भौतिकतावादी युग में संवेदना और विश्वास की परिपाटी का लोप हो रहा है और प्रेम का भरे बाजार वासना और कामना के हाथों चीरहरण हो रहा है, ऐसे में जरूरत है बदलाव की। जो प्रेम को बाजारी चमक-दमक में खोने से बचा ले। हम प्रेम में निहित संवेदना, गरिमा और इसकी आंतरिक गहराई को पहचानें। जिस दिन हम सब प्रेम का असली मर्म समझ लेंगे, उसी दिन से मनुष्य अपनी संकीर्णताओं से निकलकर बिना शर्त के प्रेम करेगा। तभी धरती भी प्रेम के रस में डूबकर नृत्य कर उठेगी और बंजर होती प्रेम की खेती हो हम बचा सकेंगे। ऐसे में सार्थक होंगी कविवृंद की ये पक्तियां-जैसो बंधन प्रेम कौ, तैसो बंध न और।
अमर उजाला काम्‍पेक्‍ट में 14 फरवरी को पृष्‍ठ 12 संपादकीय में प्रकाशित हुआ है। http://compepaper.amarujala.com/svww_index.php

February 12, 2012

राजनीति की ‘डर्टी पिक्चर’


किसी देश की राजनीति ही उस देश का भविष्य तय करती है। जिसकी दिशा-धारा तय होती है, संसद, विधानसभा और विधान परिषदों में। इसीलिए इन्हें राजनीति का मंदिर माना जाता है। देश के कर्णधारों का भविष्य भी इन्हीं मंदिरों में तय होता है। लेकिन इन मंदिरों में यदि कोई गंदगी फैलाई जाने लगे तो इन मंदिरों का संरक्षण और इनमें पूजा करने वाली जनता की नाराजगी जायज है। हमारे देश के ये मंदिर पहले से ही नोट कांड, गाली-गलौज, मारपीट और सोने वाले नेताओं के नाम पर बदनाम थे, इसमें एक काला अध्याय और जुड़ा कर्नाटक विधान सभा में हुए मोबाइल पोर्न वीडियो कांड के बाद। लेकिन सत्ता कितनी बेहया हो चुकी है यह कांड तो मात्र इसकी बानगी भर है। इस कांड के बाद राजनीति का जो चेहरा जनता के सामने आया है वो सच में डराने वाला है।
कर्नाटक विधान सभा की कार्यवाही के दौरान वहां की वर्तमान सरकार के दो मंत्री मोबाइल फोन पर अश्लील फिल्म देखते पाए गए। उनकी इस हरकत को आज के सचेत मीडिया ने सार्वजनिक कर दिया। भारत के संसदीय इतिहास में यह पहली ऐसी घटना थी, जो खुद भी इतिहास का एक काला पन्ना बन गई। इनमें से एक थे सहकारिता मंत्री लक्ष्मण सावदी और महिला और बाल विकास मंत्री सीसी पाटिल। अब सोचने वाली बात यह है कि जिन मंत्री महोदय पर महिलाओं के विकास का जिम्मा है अगर वो राजनीति के मंदिर में बैठकर इस तरह की हरकत करें। तो वे महिलाओं और देश का भविष्य बच्चों का किस तरह का विकास करेंगे। बात जब जनता के समाने आ गई तो इन दोनों नेताओं ने इस्तीफा दे दिया। परंतु देश की अस्मिता पर ये राजनेता काला तिलक लगा गए। इससे एक दो-दिन पहले ही कर्नाटक में ही सरकारी रेव पार्टी में खुलेआम सेक्स की बात भी मीडिया की सुर्खियां रही थीं। इस पूरे कांड के बाद हम यही कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति आत्महंता प्रवृत्ति की ओर बढ़ रही है। जनता पहले से ही भ्रष्टाचार, मंहगाई और सियासती दांवपेंच से परेशान थी, ऊपर नेताओं की हरकत ने राजनीति की मर्यादा को तार-तार कर दिया। भारत में कई ऐसे जननेता हैं जो दिन भर जनता के हितैषी होने की बात करते हैं और रात होते ही शराब और शबाब के नशे में डूब जाते हैं। हाल ही में हुए ‘भंवरी देवी कांड’ ने राजनीति के विभत्स चेहरे को जनता के सामने लाने का काम किया था। इससे पहले ‘मधुमिता कांड’, कश्मीर सेक्स स्कैंडल, तंदूर कांड कई ऐसे मामले जिनमें भारतीय राजनीति कीचड़ में सनी दिखाई देती है।
कर्नाटक के कंलक का रोना रोने से कुछ सधने वाला नहीं है। वर्तमान में देश का हर राज्य किसी न किसी रूप में इस अत्याचार का शिकार है। कभी हमने सोचा है कि ऐसा क्यों हो रहा है? शायद नहीं! इसका कारण भी हम सब ही हैं। हम बार-बार उन्हीं को चुनते हैं जो हमारे लिए और समाज के लिए खतरा हैं। उन्हीं की सरकार हमें सुहाती है जिनके शासन में अपराध, भ्रष्टाचार चरम पर रहा। इस पर हम यह बहाना कर सकते हैं कि हम करें भी तो क्या, विकल्प ही नहीं है हमारे पास। अब यह बहाना नहीं चलने वाला, जिस तरह हम सबने भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुटता का संदेश संपूर्ण विश्व को दिया, उसी तरह इस कलंकित राजनीति के खिलाफ भी लामबंद होना पड़ेगा। हमारा देश 65 फीसदी युवाओं का देश है। युवाओं को ही संभालनी होगी, राजनीति की बागडोर अपने हाथ में। यह हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने का समय कदापि नहीं है। हमें जागना होगा और दूसरों को जगाने के लिए प्रयास करना होगा। भारतीय राजनीति का चारित्रिक पतन ही सभी समस्याओं का मूल है। हमें बचाना होगा अपने देश के चारत्रिक गौरव को जिसके बलबूते हम सोने की चिडि़या कहलाते थे। सर्वथा उपयुक्त समय है उठ खड़े हो जाएं, अपने मूल्यों की रक्षा के लिए, तभी हम सबका भाग्य उदय हो सकता है।
यह लेख दैनिक भास्‍कर, नोएडा के संपादकीय पृष्‍ठ पर 10 फरवरी को प्रकाशित हुआ है।

February 09, 2012

बढ़ते मतदाता, बदलाव का संकेत


उत्‍तर प्रदेश में चुनाव के पहले चरण के शानदार आगाज के साथ यह अटकलें और भी तेज हो गई हैं कि मुख्‍यमंत्री का सिंहासन किस पार्टी के हाथ लगेगा? बुधवार को कड़ी सुरक्षा के बीच हुए पहले चरण में 10 जिलों सीतापुर, बाराबंकी, फैजाबाद, अम्बेडकर नगर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, सिद्धार्थनगर और बस्ती की 55 सीटों के मतदान में लगभग 64 फीसदी मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया। इसके साथ ही 862 उम्‍मीदवारों की किस्‍मत ईवीएम में बंद हो गई। 2007 के चुनाव में यहां यह संख्‍या 50 फीसदी से भी कम थी। इन्‍द्रदेव ने बारिश के माध्‍यम से मतदाताओं के हौसले को परखना चाहा लेकिन मतदाताओं ने सभी रिकार्ड ध्‍वस्‍त करने की ठानी थी। प्रदेश को अच्‍छी सरकार देने का सपना संजोये मतदाताओं ने सभी आजादी के बाद के रिकार्ड ध्‍वस्‍त करते हुए सर्वाधिक मतदान किया।  
यूपी को देश की जान है। यहां किसी पार्टी की कामयाबी का मतलब होता है, केंद्र सरकार की राजनीति में मजूबत दखलंदाजी। इसीलिए 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की चारों बड़ी पर्टियों भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस यहां एड़ी से चोटी का जोर लगा रही हैं। उत्‍तर प्रदेश का चुनाव देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। यहां उठाती सियासी गर्म हवाओं की तपन दिल्‍ली तक महसूस की जाती है। उत्‍तर प्रदेश की राजनीति ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। आजादी की क्रांति के बाद भारत की विकल्‍प से मरहूम राजनीति में जनता का केवल एक ही सहारा था, काग्रेंस। इसके पश्‍चात हुई, हरित क्रांति ने क्षेत्रीय पर्टियों के लिए जमीन तैयार की और जनता के समक्ष विकल्‍पों की भरमार हो गई। इन्‍हीं विकल्‍पों में अपना सच्‍चा हितैषी तलाशते-तलाशते जनता ने अपना अस्तित्‍व ही खो सा दिया। चंद लोगों के जनाधार के सहारे सरकारें बनी और उन्‍होंने प्रदेश को जमकर लूटा। यहां हर पार्टी ने अपने पैर जमाने के लिए नए-नए पैंतरे अपनाए। किसी ने जातिवाद का सहारा लिया, किसी ने हिन्‍दुत्‍व का तो किसी ने सोशल इंजीनियरिंग, तो कोई समाजवाद और अल्‍पसंख्‍यक राजनीति  के सहारे सत्‍ता तक पहुंचने का रास्‍ता बनाने लगा। जो भी आया बस अपना पेट भरकर चला गया। जनता बेचारी, न तो इधर की रही, न उधर की।
भ्रष्‍टाचार, अनाचार और दुराचार की मार से आहत जनता के सामने कोई विकल्‍प ही नहीं था कि 2012 के चुनाव में किस पार्टी को सौंपी जाय उत्‍तर प्रदेश के भाग्‍य की चाबी। अन्‍ना आंदोलन ने जनता को जगाने का काम किया। नए-नए घोटालों के खुलासे ने पर्टियों का कच्‍चा चिठ्ठा जनता के समाने खोल दिया। नेताओं की तू-तू, मैं-मैं और खोखले चुनावी वादों की असलियत जनता पिछले कई दशकों से देख रही थी। इसलिए अब इन पर भरोसा करना भी लाजिमी न था। इस बार भी पर्टियां ने अपने वादों के हथकंडे अपनाए, किसी ने बिजली की बात की तो किसी ने लैपटॉप की। लेकिन जनता के मन में क्‍या है ये कोई नहीं जान पाया। मणिपुर, पंजाब और उत्‍तराखंड के मतदान में मतदाताओं ने इस बार अपने इरादों से परिचित करवा ही दिया था। इसके बाद उत्‍तर प्रदेश के पहले चरण  में भी मतदाताओं ने जोशोखरोश से मतदान किया मगर मतदाताओं का बढ़ा हुआ प्रतिशत कई सवाल छोड़ कर गया है। क्‍या यह बदलाव के संकेत हैं ? क्‍या जनता जागरूक हो चुकी है? किसको समझा है जनता ने अपना रहनुमा? कौन होगा प्रदेश का राजा? ऐसे कई सवाल जिसने पार्टियों और राजनीतिक चिंतकों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। अभी प्रदेश में सात चरणों का चुनाव होना बाकी है। अगर मतदाताओं का आंकड़ा ऐसा ही रहा तो यह निश्चित ही यह एक बड़े बदलाव का सूत्रधार होगा और उत्‍तर प्रदेश तथा देश की राजनीति के लिए शुभ संकेत छोड़कर जाएगा।

February 07, 2012

यूजीसी नेट में बदलाव शुभ या अशुभ

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट/जेआरएफ) को पूरी तरह से बहुविकल्पीय कर दिया है। यूजीसी ने इस बदलाव के पीछे तर्क दिया है कि उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करने में समय और पैसा अधिक खर्च होता है। यह बदलाव कितना शुभ है या अशुभ यह सोचनीय विषय है।
राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के माध्यम से देश भर के विश्वविद्यालय को योग्य शिक्षक देने का दायित्व यूजीसी के पास है। यूजीसी साल में दो बार दिसम्बर और जून में यह परीक्षा आयोजित करती है। इसमें सफल हुए अभ्यार्थियों को देश में विभिन्न विश्वविद्यालयों, डिग्री काॅलेजों में अपनी अध्यापन क्षमता दिखाने का मौका मिलता है। अभी तक इस परीक्षा को पास करने के लिए दो बहुविकल्पीय तथा एक पेपर की विवरणात्मक हुआ करता था। इस विवरणात्मक प्रश्न पत्र के माध्यम से अभ्यार्थियों के विषयगत ज्ञान और लेखन दक्षता को परखा जाता रहा है। परंतु इस परीक्षा के तीनों प्रश्न पत्र अब बहुविकल्पीय होंगे। इसमें प्रथम प्रश्न पत्र में 60 प्रश्न पूछे जाएंगे, जिसमें 50*2=100 अंक के प्रश्न अभ्यर्थी को करने होंगे, द्वितीय प्रश्न पत्र में 50*2=100 तथा तृतीय प्रश्न पत्र में 75*2=150 प्रश्न पूछे जाएंगे। इन दोनों प्रश्न पत्रों के सभी प्रश्न का उत्तर अभ्यर्थियों को देना होगा। किसी भी प्रश्न पत्र के लिए कोई नकारात्मक अंक प्रणाली नहीं रखी गई है। इसके साथ परीक्षा को पास करने के लिए भी न्यूनतम अंक निर्धारित कर दिए गए हैं। जिसके तहत सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को प्रथम तथा द्वितीय पेपर में 40-40 प्रतिशत तथा तृतीय प्रश्न पत्र में 50 प्रतिशत यानि 75 अंक लाने होंगे। इसी प्रकार ओबीसी के अभ्यथियों को प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय प्रश्न पत्र में क्रमशः 35-35, 45 प्रतिशत, अनुसूचित जाति/जनजाति/शरीरिक रूप से विकलांग/विजुअली हैंडीकेप अभ्यर्थियों को क्रमशः 35-35 तथा 40 प्रतिशत अंक लाने होंगे। इसके अलावा अभ्यर्थी अपने उत्तरों की कार्बन काॅपी अपने साथ ले जा सकेंगे।
इस बदलाव से जायज है कि नेट परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों में खुशी की लहर दौड़ गई होगी। साथ ही यूजीसी को भी कम समय और पैसा खर्च करना होगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रणाली के माध्यम से हम विश्वविद्यालयों को अच्छे अध्यापक प्रदान की पाएंगेघ् अभी तक तृतीय प्रश्न पत्र में यूजीसी अभ्यर्थियों की खूब माथापच्ची करवाती थी, जिससे उनकी सारी क्षमताओं का आंकलन होता रहा है। परंतु क्या अब वह उनकी क्षमताओं का आंकलन बहुविकल्पीय प्रश्न पत्रों के माध्यम से कर पाएंगेंघ् किसी अध्यापक के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक होती है उसकी विषयगत दक्षता। दक्षता से अभिप्राय है उसकी लेखन, अध्ययन और अध्यापन क्षमता। इसमें लेखन सबसे अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। यदि कोई अध्यापक अपने विषय पर लिख नहीं सकता तो इसका मतलब है वह अपने विषय को न तो ठीक से पढ़ा सकता है और ना ही निभा सकता है। अब जो बदलाव हुए हैं उसमें अभ्यर्थी की विषयगत दक्षता का परीक्षण किस तरह किया जाएगाघ्
यूजीसी ने जो बदलाव किए वे सहूलियतों के लिहाज से तो ठीक है चाहें वह अभ्यर्थियों की हों या यूजीसी की। इसके माध्यम से हम देश भर के विश्वविद्यालयों में खाली पड़े अध्यापकों के पदों को भर भी सकते हैं। लेकिन इन बदलावों के बाद नेट/जेआरएफ की परीक्षा पास करके आए अभ्यर्थियों के पास क्या इतना ज्ञान होगा कि वह छात्रों और अपने विषय से न्याय कर पाए। वैसे भी पहले से ही हमारी शिक्षा प्रणाली में कई तरह की कमियां है। जिनमें सुधार की पहले से ही आवश्यकता है। ऐसा न हो कि यह बदलाव भी भविष्य में कमी के रूप में समाने आए। इस पर पुर्नविचार की आवश्यकता है।
यह लेख दैनिक भास्‍कर 6 फरवरी को नोएडा-यूपी एडीशन के पृष्‍ठ संख्‍या 7 पर प्रकाशित हुआ है।