September 17, 2012

सोशल मीडिया पर अंकुश क्यों?


परिदृश्य
आदित्य शुक्ला
जिस तरह से देश में इंटरनेट का प्रसार बढ़ रहा है, सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाना ही होगा।

हमारे देश की एकता और अखंडता को कभी जातिवाद व सांप्रदायिकता के नाम पर, तो कभी आर्थिक विषमता के नाम पर चुनौती दी जाती रही है। राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम पर भी लोगों को भड़काने की कोशिशें लगातार होती रही हैं। लेकिन यह हमारे देश की सांस्कृतिक विशिष्टता ही है कि बहुलतावादी होने के बावजूद एकता का सूत्र कभी कमजोर नहीं हो पाता है। असम में हाल ही में भड़की हिंसा के दौरान सोशल मीडिया पर अफवाहों का ऐसा दौर चला कि देश के विभिन्न हिस्सों से पूर्वोत्तर के लोग अपनी रोजी-रोटी छोड़कर पलायन करने लगे। नतीजतन सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिशें तेज हो गईं। लेकिन इससे देश भर में राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है।

असम की हिंसक घटनाओं को रोक पाने में विफल रहने के चलते जहां एक ओर सरकार की छीछालेदर हो रही है, वहीं सोशल मीडिया की छवि भी खराब हुई है। लेकिन इस पर अंकुश लगाने की कोशिशों से लोगों के बीच यह संदेश गया कि अपनी विफलता छिपाने के लिए सरकार सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की बात कर रही है। असल में जिस समय अन्ना हजारे का आंदोलन अपने चरम पर था, उस समय सोशल मीडिया ने सरकार के खिलाफ एक मोरचा ही खोल दिया था। तभी से सरकार लगातार यह कोशिश करती रही है कि सोशल मीडिया पर किसी भी तरह से प्रतिबंध लगाया जाए। यह सच है कि राष्‍ट्र की सुरक्षा की सुरक्षा सर्वोपरि है, परंतु इसकी आड़ में सरकार के भ्रष्‍ट तंत्र के खिलाफ मोरचा खोलने वाले सोशल मीडिया के नियमन को मंजूर नहीं किया जा सकता है।
हम सभी जानते हैं कि सोशल मीडिया महज अफवाह फैलाने का तंत्र नहीं है, बल्कि इसमें सृजनात्‍मकता का मंत्र भी समाहित है। यहां न तो प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया जैसा संपादकीय नियंत्रण है और न ही कंटेंट पर कैंची चलने का खतरा। यह एक ऐसा माध्‍यम है, जिसने उस जनता को आवाज दी है, जो किसी न किसी कारण से अब तक चुप रहकर सरकारी तंत्र के तमाशे को देखा करती थी। सोशल मीडिया के उपभोक्ताओं में जहां जिम्मेदार पत्रकार, रचनाकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, वहीं साइबर अपराधी, जासूस, आतंकवादी, कट्टरपंथी भी। यही वजह है कि आज सरकार को इसके नियमन का बहाना मिल गया है। इससे कोई इनकार नहीं कि इस मीडिया का कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व लगातार दुरुपयोग कर रहे हैं और देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु सोशल मीडिया के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आज़ादीके मुद्दे को थोड़ा अलग ढंग से देखे जाने की जरूरत है। सोशल मीडिया उस आईने की तरह है, जो सरकारी तंत्र के बुरे पक्षों को भी उजागर करता है। इसलिए लोग इसके नियमन से सहमत नहीं दिखते। परंतु इतना तो स्‍पष्‍ट है कि मौजूदा स्थिति में संतुलन बिठाने और राष्‍ट्र की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए कुछ ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। जनसंख्‍या के लिहाज से हमारे देश के मात्र 10 प्रतिशत लोग ही इंटरनेट का इस्‍तेमाल करते हैं। इंटरनेट के प्रसार के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है। स्‍पष्‍ट है कि जैसे-जैसे इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्‍या में इजाफा होगा, साइबर अपराध भी तेजी से बढ़ेगा। ऐसे मेंे साइबर अपराध को रोकने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाना ही होगा, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने को उचित नहीं माना जा सकता। पूर्वोत्तर की घटनाएं एक चेतावनी है। इसके अलावा सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों को भी स्व-नियमन का तरीका अपनाना होगा। राष्ट्र की सुरक्षा के मद्देनजर सोशल मीडिया के उपभोक्ता अगर स्व-नियमन का तरीका अपनाएं, तो मुट्ठी भर साइबर अपराधियों पर नकेल कसना कोई बड़ी बात नहीं है।
काम्‍पेक्‍ट अमर उजाला में 17 सितम्‍बर को प्रकाशित आलेख : http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20120917a_012108003&ileft=294&itop=58&zoomRatio=156&AN=20120917a_012108003

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