April 01, 2013

नवसृजन की तैयारी का त्योहार है होली


खुशी, प्रेम, सौहार्द, नयापन और उत्साह होली का मूल भाव है, जिसे बचाए रखने की जरूरत है, नहीं तो इसके रंग फीके पड़ जाते हैं। 
पर्व-त्योहार किसी भी देश की समृद्ध परंपरा के वाहक होते हैं। हमारा देश सदियों से ही उत्‍सवों और त्‍योहारों की भूमि रहा है। यहां कभी होली, तो कभी दिवाली और कभी ईद, तो कभी बैसाखी मनाई जाती है। परंतु विगत कुछ दशकों से इन पारंपरिक उत्सवों के रंग फीके पड़ते दिख रहे हैं। होली की ही बात करें, तो हाल के वर्षों में इसके मनाने के तरीकों में काफी गिरावट देखी गई है।
होली जहां सामाजिकता और धार्मिकता से जुड़ी है, वहीं यह रंगों का त्‍योहार भी है। यह एक ऐसा सरस पर्व है, जो आनंद के उत्‍सव के रूप में मनाया जाता है। समाज का हर वर्ग इसे बहुत ही उत्‍साह के साथ मनाता है। इसमें जातिभेद-वर्णभेद का कोई स्‍थान नहीं होता। वास्‍तव में होली समाज की सामूहिक संस्कृति का परिचायक है। फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्‍योहार दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन लोग रात को लकड़ियों तथा कंडों का ढेर लगाकर होलिका पूजन और दहन करते हैं। इस दिन होली जलाकर लोग आपसी दुश्मनी एवं बैर को भुलाकर सौहार्द एवं सद्भाव के साथ रहने का संकल्प लेते हैं। अगले दिन रंग-गुलाल लगाकर एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं। होली बुरी प्रवृत्तियों पर अच्छाइयों की जीत का पर्व है, लेकिन आज होली के त्योहार में बुराइयां ही हावी होती दिख रही हैं।
हाल के दशकों में जिस तरह से हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी गई है, उसी तरह लोग अपनी परंपराओं एवं पर्वों के मूल स्वरूप को भुलाकर उन्‍हें विकृत ढंग से मनाने लगे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले जो हमें अपनी समृद्ध परंपराओं से पारस्‍परिक सौहार्द और सामाजिक समरसता बढ़ाने में मिलती थी, वह समाप्त होने लगा। इस बाजारवादी दौर में लोगों में लाभ कमाने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ी है कि लोग त्योहारों के अवसर पर मिलावट करने से भी बाज नहीं आते। इसका सबसे बुरा असर होली के त्योहार पर पड़ता है। मिठाई में मिलावट तो जगजाहिर बात है, लेकिन रंगों एवं गुलाल में भी मिलावट होने लगी है, जिसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। मुझे याद आते हैं बचपन के वे दिन, जब होली आने से एक महीने पहले से ही घरों में इसकी तैयारियां शुरू हो जाती थीं। होली में जमकर गुझिया और चिप्‍स-पापड़ उड़ाए जाते थे। लेकिन आज ये सारी तैयारियां बाजार में खो गई हैं। सबकुछ बाजार से तैयार आता है। लोगों की इसी मनोवृत्ति का लाभ बाजार के बनिए उठाते हैं। प्राकृतिक रंगों की जगह जहरीले रसायन युक्‍त रंगों ने ले ली है। इसके अलावा कीचड़, धूल और अन्‍य कई तरह की चीजों का उपयोग होली पर किया जाने लगा। इसके चलते न केवल लाखों लीटर पानी की बर्बादी होती है, बल्कि झगड़े एवं खून-खराबे की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। इतना ही नहीं, लोग भांग एवं शराब का सेवन कर इस पर्व की मूल मर्यादा को ही भूल जाते हैं और महिलाओं के साथ बदतमीजी करने से भी बाज नहीं आते।
हमारे गांव की एक परंपरा याद है मुझे, लोग रंग खेलने के बाद शाम को एक-दूसरे के घर जाकर पुरानी रंजिश भुलाकर गले मिलते थे। यह परंपरा भी धीरे-धीरे लुप्‍त हो चली है। आज लोगों के पास सामाजिक रिश्तों के लिए समय ही नहीं बचा है। आज तो लोग इस दिन को लोग पुरानी दुश्‍मनी का बदला चुकाने के लिए चुनते हैं। समझदारी के अभाव के चलते होली का स्‍वरूप विकृत हो चला है और सदियों से चली आ रही समृद्ध परंपरा खत्म होती दिख रही है।
होली ऐसे समय आती है, जब कंपकपाती ठंड विदा हो चुकी होती है, खेतों में नई फसल पकने वाली होती है। पतझड़ के बाद धरती हरियाली की नई चादर ओढ़ लेती है। ऐसा लगता है, मानो नवसृजन की तैयारियां चल रही हों, जिंदगी अपने सारे राग-रंग लेकर नाचने को आतुर हो। यही है होली का मूलभाव। खुशी, प्रेम, नयापन, हंसी और पारस्‍परिक सौहार्द। इस मूल भाव को बचाने की जरूरत है। लुप्‍त होती परंपरा को बचाने की जरूरत है। अगर इस पर्व को समझदारी से मनाया जाए, तो लोक कल्याण का साधन बनाया जा सकता है। 
काम्‍पेक्‍ट अमर उजाला में 27 मार्च को होली पर्व पर प्रकाशित आलेख का लिंक-
http://compepaper.amarujala.com/pdf/2013/03/27/20130327a_012105.pdf

February 12, 2013

भावों और संस्कृतियों के संगम में


बारह वर्षों के इंतजार के बाद आने वाला कुंभ देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोगों के लिए एक चमत्कार सरीखा है। हर कुंभ में देश-विदेश के करोड़ों लोग पहुंचते हैं और पतित-पावनी नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। महीनों चलने वाले इस आयोजन का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही, यह पर्यटन एवं व्यापार को भी बढ़ावा देता है। लेकिन अफसोस कि यह विशाल आयोजन मात्र प्रदर्शन का मंच बनकर रह गया है। शाही स्‍नानों पर संतों के अखाड़ों की अपार संपदा और आम जनता की आस्‍था का प्रदर्शन, बस इन्हीं दो पहलुओं के इर्द-गिर्द कुंभ के महापर्व की कहानी सिमटकर रह गई है।
हमारे देश में पुरुषार्थ चतुष्टय के तहत धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की महत्ता का वर्णन किया गया है। पुरुष चतुष्टय का यह धर्म मानवधर्म है, युगधर्म है। लेकिन सवाल उठता है कि कुंभनगरी में पधारने वाले हमारे संत-महात्मा, जो तेन त्यक्तेन भुंजीथा का जाप करते हैं, वे अपनी अपार धन-संपदा का प्रदर्शन करके क्या जताना चाहते हैं। जिस देश में करोड़ों लोग भूख एवं कुपोषण से मर जाते हैं, वहां संतों द्वारा शिष्यों से प्राप्त अकूत धन-संपत्ति के प्रदर्शन का क्या मतलब है!
यह सवाल भी मन में उठता है कि जब देश जल रहा होता है, तब धर्म को बचाने का दावा करने वाले हमारे संत-महात्‍मा चुप क्‍यों बैठे रहते हैं? पिछले दिसंबर में दिल्‍ली में घटी घटना की निंदा देश ही नहीं, दुनिया भर में हुई, लेकिन हमारे संत-महात्माओं की चुप्पी नहीं टूटी। हमारे संत-महात्माओं को भी देश-काल की समस्याओं के प्रति सकारात्मक एवं प्रगतिशील रवैया अपनाना चाहिए।
इसके अलावा, जब आम अमावस्‍या या पूर्णिमा के दिन होने वाला छोटा स्नान नदियों को इतना अधिक गंदा कर जाता है, तो कुंभ के विशाल आयोजन के दौरान नदियों की क्या स्थिति होती होगी। गंगा को बचाने की बात करने वाले साधु-संत क्या इसे पवित्र रखने में योगदान नहीं दे सकते? अगर साधु-संत सोच लें कि देश की जीवनरेखा गंगा नदी को पवित्र रखना है और उसके लिए सभी योजना बनाकर सफाई अभियान में लग जाएं, तो वह दिन दूर नहीं, जब गंगा पहले की तरह पवित्र और निर्मल हो जाएगी। पर ऐसा न होते देख लगता है कि देश आस्‍था व दिखावे के नाम पर लुट रहा है। दुखद है कि भारतीय संस्‍कृति का यह ऐतिहासिक आयोजन कुंभ धीरे-धीरे इसी लूट का जरिया बनता जा रहा है।
लेकिन यह समझ लेना भी जरूरी है कि कुंभ दिखावा, ढोंग, वैभव या आस्‍था का आडंबरी प्रदर्शन मात्र नहीं है। यह मोक्ष की कामना भर भी नहीं है कि अमृत कलश की दो बूंदंे हमें भी अमरत्व प्रदान कर देंगी। कुंभ के मूल मे छिपी है, भारतीय संस्‍कृति की विश्‍वविजयी अभियान की चिर गाथा, जिसके बूते हमारा देश विश्‍व गुरु कहलाया। एक वह दौर भी था, जब हमारे संतों ने देश की राजनीति को नई दिशा देकर इतिहास की नई इबारत लिखी थी। चाहे चाणक्‍य जैसे संत का सम्राट चंद्रगुप्‍त का मार्गदर्शन करना हो, या संत रामदास जैसे गुरु का शिवाजी को तैयार करना, हर जगह धर्म और संस्‍कृति ही मूल में विद्यमान थी। कुंभ के अवसर पर संतों को देश को नई दिशा देने का संकल्प लेना चाहिए।
आज के संतों और महात्‍माओं को भी चाहिए कि दिखावे से ऊपर उठकर भारतीय संस्‍कृति की मूल विचारधारा से जुड़ें, ताकि देश को नई दिशा देकर मौजूदा समस्याओं से निजात दिला सकें। भुखमरी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्‍टाचार, व्‍यभिचार और दुराचार जैसी समस्‍याओं के समाधान का अमृत यदि हमारा धर्मतंत्र छलकाने लगे, तो हमारे देश को फिर से जगद्गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता। कुंभ संस्‍कृतियों, विचारों और भावों का संगम है। यह एक ऐसा मंच है, जहां से देश की समस्‍याओं के निदान की बात उठे, जहां से क्रांति के सुर फूटे और संपूर्ण विश्‍व-वसुधा को शांति के रंग में रंग दे। अगर ऐसा होगा, तभी कुंभ के आयोजन की सार्थकता दिखेगी। जिस नदी के पानी में स्नान कर हम अपनी आत्मा को पवित्र करने का एहसास पाते हैं, उसे पवित्र रखना भी हम सबका कर्तव्य है।

11/02/2013 के कम्‍पेक्‍ट में छपा हमारा आलेख पढ़ें।

http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20130211a_012108007&ileft=300&itop=71&zoomRatio=158&AN=20130211a_012108007