October 14, 2016

कुपोषण और भूख से जूझता देश

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रत्येक वर्ष जारी होने वाले वैश्विक भूख सूचकांक की ताजा रिपोर्ट में भारत भूख से हारता दिख रहा है। एक बार फिर भूखमरी और कुपोषण की बदहाली भारत के थोथे विकास को आईना दिखा रही है। सूची में शामिल 118 देशों की सूची में 28.5 अंकों के साथ भारत 97वें स्थान पर है। जो पिछले वर्षों के आंकड़ों से बदतर है। विश्व में सर्वाधिक तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का यह हाल देखकर लगता है कि भारत अपने देश के लोगों को भोजन देने में असमर्थ है। अगर अभी यह हाल है तो आने वाले 10 सालों में जब भारत की जनसंख्या विश्व में सबसे ज्यादा होगी तो यह स्थिति और भी अधिक बदतर हो जायेगी।
वैश्विक भुखमरी सूचकांक विश्व के विकासशील देशों में भुखमरी तथा कुपोषण की गणना एवं इसके तुलनात्मक अध्ययन हेतु एक बहुआयामी सूचकांक है। इस सूचकांक को अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थानद्वारा दो गैर-सरकारी संगठनों वेल्ट हंगर हिल्फ’  और कंसर्न वर्ल्ड वाइडकी सहायता से प्रति वर्ष प्रकाशित किया जाता है। इस सूचकांक को गत वर्ष तक तीन संकेतकों अल्पपोषण’, ‘बाल अल्पवजन’  एवं बाल मृत्यु दर’, के आधार पर तैयार किया गया था किंतु वर्ष 2016 के वैश्विक भुखमरी सूचकांक को चार संकेतकों अल्पपोषण’, ‘लंबाई के अनुपात में कम वजन अर्थात बाल दुबलापन’ , आयु के अनुपात में कम लंबाई अर्थात बाल ठिगनापनतथा बाल मृत्यु दरके आधार पर तैयार किया गया है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक 100 आधार बिंदुओं के पैमाने पर तैयार किया जाता है जिसमें शून्य सबसे अच्छा स्कोर माना जाता है अर्थात कोई भूखा नहीं जबकि 100 सबसे खराब स्कोर होता है जिसमें सभी भुखमरी की स्थिति में हैं। यह दोनों ही स्थितियां व्यवहार में नहीं पाई जाती हैं। व्यवहार में  जीरो से 100  के बीच की स्थिति पाई जाती है। इस सूचकांक में कम मान’  देश की अच्छी स्थिति को दिखाता है, वहीं अधिक मानदेश में भुखमरी की भयावहता को प्रदर्शित करता है। रिपोर्ट भारत के लिए संतोषजनक नहीं हैं। क्योंकि उसे गंभीर देशों की श्रेणी में रखा गया है। भारत में 39 फीसदी बच्चे बौने तथा कुपोषण के शिकार हैं। पड़ोसी देशों से तुलना करें तो भारत की स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश से बहुत थोड़ी अच्छी है। इनसे वह दोचार पायदान ऊपर है। जबकि श्रीलंका और नेपाल से बहुत पीछे है। यही नहीं, भारत अफ्रीका के गरीबी से जूझ रहे कई देशों से भी बहुत पीछे है। इस सूची में चीन का स्थान तीसवां है और वह हमसे 67 पायदान ऊपर हैं।
यह पहली रिपोर्ट नहीं है जिसने भारत के विकास की पोल खोली है। इससे पूर्व भी संयुक्त राष्ट संघ की 2014—15 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 20 लाख लोग भूख के शिकार थे। अगर अर्थशास्त्रियों की माने तो इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण बेरोजगारी है। यह सर्वविदित है कि भारत ने शिक्षा के स्तर पर अभूतपूर्व सफलता हासिल की लेकिन जिन लोगों को शिक्षित किया उन्हें रोजगार देने में सरकारें विफल रहीं। स्टार्ट अप इंडिया और मेक इन इंडिया के माध्यम से मोदी सरकार ने कुछ प्रयास किया लेकिन वह नाकाफी ही नज़र रहा है। लेबर ब्यूरों के आंकड़ों की बात करें तो देश का 2014—15 में बेरोजगारी रेट पिछले पांच वर्षों की तुलना में सबसे ज्यादा रहा।
अगर इस वैश्विक भूख सूचकांक कुल जनसंख्या में कुपोषणग्रस्त लोगों के अनुपात, पांच वर्ष से कम उम्र वर्ग में सामान्य से कम वजन के बच्चों की संख्या और पांच साल से कम आयु के बालकों की मृत्युदर के आधार पर बनता है।
इसमें भारत की स्थिति बिगड़ने की अहम वजह पांच साल तक के बच्चों में कुपोषण रहा। इसका कारण मध्याह्न भोजन, एकीकृत बाल विकास, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और मनरेगा जैसे कार्यक्रम और योजनाएं का सही ढंग से लागू हो पाना ही रहा होगा। मनरेगा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाओं को छोड़ दें तो अन्य योजनाएं दशकों से लागू हैं। तब इनके सार्थक सकारात्मक परिणाम मानव प्रगति सूचकांक से जुड़ी पिछली रिपरेटों में क्यों नजर नहीं आते? इसका अर्थ है जमीनी स्तर पर अभी भी कोर कसर बाकी है या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भारत को वैश्विक स्तर पर यह सब देखना पड़ता है। अगर भारत के राज्यों की बात करें तो एक रिपोर्ट के अनुसार यहां मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार सबसे ज्यादा खराब स्थिति वाले राज्य हैं।

दक्षिण एशिया में सबसे तेज बढ़ने वाले देश की इस स्थिति को देखकर लगता है कि कहीं विकास की झूठी कहांनियां तो नहीं गढ़ी जा रही। ऐसे में राजनेताओं को जीडीपी दर से भी आगे उठकर जमीनी स्तर पर जाकर देश की स्थिति को समझना होगा। तभी देश में गरीबी, बेरोजगारी और कुपोषण की स्थिति का सही आंकलन किया जा सकता है। नहीं तो वैश्विक स्तर की इन रिपोर्टों में देश यूं ही भूख से हारता रहेगा।

यह लेख दैनिक जनसंदेश मध्यप्रदेश में 14 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित हुआ।