अप्रैल 03, 2014

बिगड़ रहा है भाजपा का सियासी समीकरण!

एक तरफ चुनावी सर्वे एनडीए को बहुमत से कम सीटें बता रहे हैं, दूसरी ओर भाजपा के आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।
आगामी सात अप्रैल को पहले चरण का मतदान शुरू होते ही लोकसभा चुनाव का आगाज हो जाएगा। नौ चरणों में होने वाले इस चुनाव पर संपूर्ण देश की नजरे टिकी हैं। परंतु वर्तमान भारतीय राजनीति के सभी समीकरण उलझे हुए से प्रतीत हो रहे हैं। सत्‍ताधारी पार्टी कांग्रेस ऐसी रणनीति पर चल रही है, जैसे वह पिछले एक दशक से विपक्ष में रही हो। वाम मोर्चा बिखरा-बिखरा नजर आ रहा है। दिल्‍ली में 49 दिनों की सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी राजनीति में खास होती नजर आ रही है।
इसके इतर अनेक राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। भाजपा के लिए सत्ता के दरवाजे खुल गए हैं। माना जा रहा है कि संपूर्ण देश में मोदी की लहर चल रही है। मोदी भी अपनी रैलियों में मंच से बार-बार यही घोषणा करते हैं कि जनता ने दिल्‍ली की गद्दी उन्‍हें सौंपने का मन बना लिया है। लेकिन हाल के चुनावी सर्वे कुछ अलग की कहानी बयां कर रहे हैं। हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक भाजपा का 272 के आंकड़े को पार करने का सपना पूरा नहीं होने जा रहा है।
ताजा सर्वे में यूपीए को 119 से139, एनडीए को 225 से 235 एवं अन्य को 185 से 232 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। वोट शेयर के मामले में यूपीए को 26 फीसदी, एनडीए को 34 फीसदी एवं अन्य को 40 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है। अब इस आंकड़े को देखें, तो लगता है कि इस बार का चुनाव यूपीए बनाम एनडीए न होकर अन्‍य बनाम एनडीए हो रहा है। ऐसे में 66 फीसदी वोट एनडीए के खिलाफ जाता हुआ दिखाई दे रहा है। अगर भाजपा विरोधी ताकतें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एकजुट हो जाती हैं, तो 2014 में इनके पास पूर्ण बहुमत होगा। इसका मतलब यह हुआ कि यूपीए फिर चुपके-चुपके सरकार बनाने की ओर बढ़ रहा है। प्रकाश करात का यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को समर्थन देने के लिए पत्र लिखना भविष्‍य में यूपीए एवं वाम दलों के गठबंधन के संकेत दे रहा है। ज्यादातर सर्वे बता रहे हैं कि एनडीए गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलना मुश्किल है। ऐसे में नरेंद्र मोदी या भाजपा के किसी नेता के प्रधानमंत्री बनाने के आसार कम होते दिख रहे हैं। सभी पूर्वानुमान यही बता रहे हैं कि कि कांग्रेस की भूमिका अहम होने वाली है। शायद इसीलिए कांग्रेस आक्रामकता को त्‍यागकर एक निर्णायक की तरह लोकसभा चुनाव के राजनीतिक रियालिटी शो का आनंद ले रही है। इससे यही निष्‍कर्ष निकलता है कि एनडीए में मोदी का कद जितना बढ़ा है, उतना ही फायदा कांग्रेस को हुआ है, जो खुद को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष बताती है।
एक तरफ चुनावी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, दूसरी तरफ भाजपा के आंतरिक मतभेद भी खुलकर सामने आ रहे हैं। मुख्‍तार अब्‍बास नकबी की ट्वीट, जसवंत सिंह का निर्दलीय चुनाव लड़ना, कानपुर में मुरली मनोहर जोशी का विरोध, मथुरा में हेमामालिनी का विरोध, नवजोत सिंह सिद्धु का अरुण जेटली के चुनाव प्रचार में शामिल होने से इन्कार करना, सब मिलकर मोदी की उलझन को बढ़ा रहे हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को केवल 20 से 25 सीटें ही मिल रही हैं। अगर एनडीए को केंद्र में अपनी सरकार बनानी है, तो उनके पास एक ही विकल्प है कि वह अभी से मायावती, जयलालिता, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू एवं बीजद के साथ गठबंधन के लिए प्रयास शुरू कर दे, क्योंकि इन सबके सहयोग से ही एनडीए 272+ के जादुई आंकड़े को छू सकेगा। लेकिन मुश्किल यह है कि इनमें से अधिकांश दल नरेंद्र मोदी की छवि से चिढ़ते हैं। इसके अलावा उनका मानना है कि मोदी अगर प्रधानमंत्री बने, तो अमीरी-गरीबी की खाई को और अधिक गहरा कर देंगे यानी उनके आते ही कॉरपोरेट जगत का बोलबाला हो जाएगा। उन्‍हें नई आर्थिक उदारवादी नीतियों का मसीहा माना जा रहा है। फिलहाल तो भाजपा के घोषणापत्र में देरी भी यही दर्शाती है कि वह खुद में ही उलझी हुई है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में कौन ऐसा नेता होगा, जो सरकार गठन के लिए अन्य दलों को जोड़ पाएगा।

मार्च 24, 2014

क्या गुल खिलाएगा प्रदेश का सियासी समीकरण




उत्तर प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों पर सभी प्रमुख दलों की नजरें लगी हैं, इसलिए सभी हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। 
लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। चुनाव आयुक्त ने नौ चरणों में होने वाले चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है। इस लोकसभा चुनाव में पिछली बार की तुलना में दस करोड़ ज्यादा मतदाता (कुल 81.4 करोड़) भाग लेंगे। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों की घोषणा शुरू कर दी है, जिसे देखकर लगता है कि अधिकांश दलों को दागी और बागी प्रत्याशियों से कोई परहेज नहीं है। प्रत्‍याशियों के चुनाव में जाति, वंश और वोट बैंक को ध्‍यान में रखकर टिकट बांटे जा रहे हैं। अब तक किसी पार्टी ने अपना घोषणापत्र जारी नहीं किया है। वह तब जारी किया जाएगा, जब उस पर चर्चा के लिए वक्त नहीं बचेगा।
इस बार भी सभी दलों की नजर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश पर है, जहां लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीटे हैं। मतदाताओं को रिझाने के लिए राजनीतिक दल तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगे हैं। आजादी के बाद देश को आठ प्रधानमंत्री देने वाले इस राज्‍य का राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अनुमान लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। प्रदेश का सियासी समीकरण क्या गुल खिलाएगा, यह देखने वाली बात होगी।
भाजपा के लिए जहां उत्तर प्रदेश में फतह का मतलब 272 के जादुई आंकड़े को हासिल करना है, वहीं कांग्रेस को सीट बचाने की चिंता है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के लिए तो यह अस्तित्व की लड़ाई ही है।
उत्तर प्रदेश में 18.5 फीसदी मुस्लिम, 9 फीसदी यादव, 27.5 फीसदी अन्‍य पिछड़ा वर्ग एवं बनिये, 22 फीसदी दलित, 8 फीसदी ठाकुर,13 फीसदी ब्राह्मण और 2 फीसदी जाट मतदाता हैं। आंकड़ों की मानें, तो मुस्लिम और अन्‍य पिछड़ा वर्ग के मतदाता चुनाव में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले हैं। जहां सपा मुस्लिमों की सबसे हितैषी पार्टी होने का दावा करती है, वहीं बसपा दलितों के साथ खड़ी दिखाई देती है। परंतु मुजफ्फरनगर दंगों के बाद समाजवादी पार्टी को पहले की तरह मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन हासिल नहीं होने वाला है। इसके अलावा, मौजूदा समाजवादी पार्टी की सरकार के कामकाज से भी प्रदेश की जनता खुश नहीं दिखाई देती है। वहीं बसपा केवल दलित बाहुल्‍य इलाकों में ही अच्‍छा प्रदर्शन करती दिखाई दे रही है। इसके अलावा केंद्र में कांग्रेसी भ्रष्‍टाचार का समर्थन करने के कारण जनता सपा और बसपा, दोनों से नाखुश है।
ऐसे में सारा दारोमदार आ टिकता है अन्‍य पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक पर, शायद इसी कारण भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के अति पिछड़ा वर्ग से होने को ज्यादा प्रचारित करता रहा है। भाजपा ने अति पिछड़ा कार्ड खेलकर इस लड़ाई को और धारदार बना दिया है, क्योंकि राज्य की 80 में से 45 सीटों पर अति पिछड़ी जातियों की तादाद लगभग डेढ़ से चार लाख के बीच है। लेकिन जीत के लिए भाजपा को सवर्ण वर्ग का वोट भी हासिल करना होगा, क्योंकि कभी-कभी वोटों का मामूली अंतर भी परिणाम को नाटकीय ढंग से बदल देता है।
इसके अलावा, इस बार बड़ी संख्या में युवा और नए मतदाता वोट डालेंगे, जो किसी भी अनुमान को पलट सकने की क्षमता रखते हैं। यूपीए-दो की सरकार के कामकाज के प्रति युवाओं में भारी गुस्सा है, जिसका इजहार इस चुनाव में देखने को मिल सकता है। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मायावती की पार्टी बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की अटकलों को पहले ही खारिज कर दिया है, किंतु भाजपा और बसपा गठबंधन की संभावनाओं के बारे में प्रदेश की गलियों, चौराहों और नुक्कड़ों पर खूब चर्चा हो रही है। हर चुनाव में कहा जाता है कि राजनीति लीक बदल रही है, लेकिन हर बार प्रदेश की राजनीति अपने पुराने जातिवादी और अवसरवादी रूप में सामने आती है। लेकिन अब मतदाता काफी जागरूक हो चुका है, जिसे खाली घोषणाओं का लॉलीपाप दिखाकर ठगने का दौर खत्म हो चुका है। कौन सी पार्टी मतदाताओं का भरोसा जीतने में कामयाब होती है, यह तो नतीजों की घोषणा के बाद ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल जाति और वंशवाद के सहारे पार्टियां चुनावी मंझधार पार करने की जुगत में लगी हैं।

अप्रैल 01, 2013

नवसृजन की तैयारी का त्योहार है होली


खुशी, प्रेम, सौहार्द, नयापन और उत्साह होली का मूल भाव है, जिसे बचाए रखने की जरूरत है, नहीं तो इसके रंग फीके पड़ जाते हैं। 
पर्व-त्योहार किसी भी देश की समृद्ध परंपरा के वाहक होते हैं। हमारा देश सदियों से ही उत्‍सवों और त्‍योहारों की भूमि रहा है। यहां कभी होली, तो कभी दिवाली और कभी ईद, तो कभी बैसाखी मनाई जाती है। परंतु विगत कुछ दशकों से इन पारंपरिक उत्सवों के रंग फीके पड़ते दिख रहे हैं। होली की ही बात करें, तो हाल के वर्षों में इसके मनाने के तरीकों में काफी गिरावट देखी गई है।
होली जहां सामाजिकता और धार्मिकता से जुड़ी है, वहीं यह रंगों का त्‍योहार भी है। यह एक ऐसा सरस पर्व है, जो आनंद के उत्‍सव के रूप में मनाया जाता है। समाज का हर वर्ग इसे बहुत ही उत्‍साह के साथ मनाता है। इसमें जातिभेद-वर्णभेद का कोई स्‍थान नहीं होता। वास्‍तव में होली समाज की सामूहिक संस्कृति का परिचायक है। फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्‍योहार दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन लोग रात को लकड़ियों तथा कंडों का ढेर लगाकर होलिका पूजन और दहन करते हैं। इस दिन होली जलाकर लोग आपसी दुश्मनी एवं बैर को भुलाकर सौहार्द एवं सद्भाव के साथ रहने का संकल्प लेते हैं। अगले दिन रंग-गुलाल लगाकर एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं। होली बुरी प्रवृत्तियों पर अच्छाइयों की जीत का पर्व है, लेकिन आज होली के त्योहार में बुराइयां ही हावी होती दिख रही हैं।
हाल के दशकों में जिस तरह से हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी गई है, उसी तरह लोग अपनी परंपराओं एवं पर्वों के मूल स्वरूप को भुलाकर उन्‍हें विकृत ढंग से मनाने लगे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले जो हमें अपनी समृद्ध परंपराओं से पारस्‍परिक सौहार्द और सामाजिक समरसता बढ़ाने में मिलती थी, वह समाप्त होने लगा। इस बाजारवादी दौर में लोगों में लाभ कमाने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ी है कि लोग त्योहारों के अवसर पर मिलावट करने से भी बाज नहीं आते। इसका सबसे बुरा असर होली के त्योहार पर पड़ता है। मिठाई में मिलावट तो जगजाहिर बात है, लेकिन रंगों एवं गुलाल में भी मिलावट होने लगी है, जिसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। मुझे याद आते हैं बचपन के वे दिन, जब होली आने से एक महीने पहले से ही घरों में इसकी तैयारियां शुरू हो जाती थीं। होली में जमकर गुझिया और चिप्‍स-पापड़ उड़ाए जाते थे। लेकिन आज ये सारी तैयारियां बाजार में खो गई हैं। सबकुछ बाजार से तैयार आता है। लोगों की इसी मनोवृत्ति का लाभ बाजार के बनिए उठाते हैं। प्राकृतिक रंगों की जगह जहरीले रसायन युक्‍त रंगों ने ले ली है। इसके अलावा कीचड़, धूल और अन्‍य कई तरह की चीजों का उपयोग होली पर किया जाने लगा। इसके चलते न केवल लाखों लीटर पानी की बर्बादी होती है, बल्कि झगड़े एवं खून-खराबे की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। इतना ही नहीं, लोग भांग एवं शराब का सेवन कर इस पर्व की मूल मर्यादा को ही भूल जाते हैं और महिलाओं के साथ बदतमीजी करने से भी बाज नहीं आते।
हमारे गांव की एक परंपरा याद है मुझे, लोग रंग खेलने के बाद शाम को एक-दूसरे के घर जाकर पुरानी रंजिश भुलाकर गले मिलते थे। यह परंपरा भी धीरे-धीरे लुप्‍त हो चली है। आज लोगों के पास सामाजिक रिश्तों के लिए समय ही नहीं बचा है। आज तो लोग इस दिन को लोग पुरानी दुश्‍मनी का बदला चुकाने के लिए चुनते हैं। समझदारी के अभाव के चलते होली का स्‍वरूप विकृत हो चला है और सदियों से चली आ रही समृद्ध परंपरा खत्म होती दिख रही है।
होली ऐसे समय आती है, जब कंपकपाती ठंड विदा हो चुकी होती है, खेतों में नई फसल पकने वाली होती है। पतझड़ के बाद धरती हरियाली की नई चादर ओढ़ लेती है। ऐसा लगता है, मानो नवसृजन की तैयारियां चल रही हों, जिंदगी अपने सारे राग-रंग लेकर नाचने को आतुर हो। यही है होली का मूलभाव। खुशी, प्रेम, नयापन, हंसी और पारस्‍परिक सौहार्द। इस मूल भाव को बचाने की जरूरत है। लुप्‍त होती परंपरा को बचाने की जरूरत है। अगर इस पर्व को समझदारी से मनाया जाए, तो लोक कल्याण का साधन बनाया जा सकता है। 
काम्‍पेक्‍ट अमर उजाला में 27 मार्च को होली पर्व पर प्रकाशित आलेख का लिंक-
http://compepaper.amarujala.com/pdf/2013/03/27/20130327a_012105.pdf

फ़रवरी 12, 2013

भावों और संस्कृतियों के संगम में


बारह वर्षों के इंतजार के बाद आने वाला कुंभ देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोगों के लिए एक चमत्कार सरीखा है। हर कुंभ में देश-विदेश के करोड़ों लोग पहुंचते हैं और पतित-पावनी नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। महीनों चलने वाले इस आयोजन का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही, यह पर्यटन एवं व्यापार को भी बढ़ावा देता है। लेकिन अफसोस कि यह विशाल आयोजन मात्र प्रदर्शन का मंच बनकर रह गया है। शाही स्‍नानों पर संतों के अखाड़ों की अपार संपदा और आम जनता की आस्‍था का प्रदर्शन, बस इन्हीं दो पहलुओं के इर्द-गिर्द कुंभ के महापर्व की कहानी सिमटकर रह गई है।
हमारे देश में पुरुषार्थ चतुष्टय के तहत धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की महत्ता का वर्णन किया गया है। पुरुष चतुष्टय का यह धर्म मानवधर्म है, युगधर्म है। लेकिन सवाल उठता है कि कुंभनगरी में पधारने वाले हमारे संत-महात्मा, जो तेन त्यक्तेन भुंजीथा का जाप करते हैं, वे अपनी अपार धन-संपदा का प्रदर्शन करके क्या जताना चाहते हैं। जिस देश में करोड़ों लोग भूख एवं कुपोषण से मर जाते हैं, वहां संतों द्वारा शिष्यों से प्राप्त अकूत धन-संपत्ति के प्रदर्शन का क्या मतलब है!
यह सवाल भी मन में उठता है कि जब देश जल रहा होता है, तब धर्म को बचाने का दावा करने वाले हमारे संत-महात्‍मा चुप क्‍यों बैठे रहते हैं? पिछले दिसंबर में दिल्‍ली में घटी घटना की निंदा देश ही नहीं, दुनिया भर में हुई, लेकिन हमारे संत-महात्माओं की चुप्पी नहीं टूटी। हमारे संत-महात्माओं को भी देश-काल की समस्याओं के प्रति सकारात्मक एवं प्रगतिशील रवैया अपनाना चाहिए।
इसके अलावा, जब आम अमावस्‍या या पूर्णिमा के दिन होने वाला छोटा स्नान नदियों को इतना अधिक गंदा कर जाता है, तो कुंभ के विशाल आयोजन के दौरान नदियों की क्या स्थिति होती होगी। गंगा को बचाने की बात करने वाले साधु-संत क्या इसे पवित्र रखने में योगदान नहीं दे सकते? अगर साधु-संत सोच लें कि देश की जीवनरेखा गंगा नदी को पवित्र रखना है और उसके लिए सभी योजना बनाकर सफाई अभियान में लग जाएं, तो वह दिन दूर नहीं, जब गंगा पहले की तरह पवित्र और निर्मल हो जाएगी। पर ऐसा न होते देख लगता है कि देश आस्‍था व दिखावे के नाम पर लुट रहा है। दुखद है कि भारतीय संस्‍कृति का यह ऐतिहासिक आयोजन कुंभ धीरे-धीरे इसी लूट का जरिया बनता जा रहा है।
लेकिन यह समझ लेना भी जरूरी है कि कुंभ दिखावा, ढोंग, वैभव या आस्‍था का आडंबरी प्रदर्शन मात्र नहीं है। यह मोक्ष की कामना भर भी नहीं है कि अमृत कलश की दो बूंदंे हमें भी अमरत्व प्रदान कर देंगी। कुंभ के मूल मे छिपी है, भारतीय संस्‍कृति की विश्‍वविजयी अभियान की चिर गाथा, जिसके बूते हमारा देश विश्‍व गुरु कहलाया। एक वह दौर भी था, जब हमारे संतों ने देश की राजनीति को नई दिशा देकर इतिहास की नई इबारत लिखी थी। चाहे चाणक्‍य जैसे संत का सम्राट चंद्रगुप्‍त का मार्गदर्शन करना हो, या संत रामदास जैसे गुरु का शिवाजी को तैयार करना, हर जगह धर्म और संस्‍कृति ही मूल में विद्यमान थी। कुंभ के अवसर पर संतों को देश को नई दिशा देने का संकल्प लेना चाहिए।
आज के संतों और महात्‍माओं को भी चाहिए कि दिखावे से ऊपर उठकर भारतीय संस्‍कृति की मूल विचारधारा से जुड़ें, ताकि देश को नई दिशा देकर मौजूदा समस्याओं से निजात दिला सकें। भुखमरी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्‍टाचार, व्‍यभिचार और दुराचार जैसी समस्‍याओं के समाधान का अमृत यदि हमारा धर्मतंत्र छलकाने लगे, तो हमारे देश को फिर से जगद्गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता। कुंभ संस्‍कृतियों, विचारों और भावों का संगम है। यह एक ऐसा मंच है, जहां से देश की समस्‍याओं के निदान की बात उठे, जहां से क्रांति के सुर फूटे और संपूर्ण विश्‍व-वसुधा को शांति के रंग में रंग दे। अगर ऐसा होगा, तभी कुंभ के आयोजन की सार्थकता दिखेगी। जिस नदी के पानी में स्नान कर हम अपनी आत्मा को पवित्र करने का एहसास पाते हैं, उसे पवित्र रखना भी हम सबका कर्तव्य है।

11/02/2013 के कम्‍पेक्‍ट में छपा हमारा आलेख पढ़ें।

http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20130211a_012108007&ileft=300&itop=71&zoomRatio=158&AN=20130211a_012108007

दिसंबर 17, 2012

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अक्टूबर 08, 2012

समग्र विकास से ही खुशहाली संभव


यह उदारीकरण का ही कमाल है कि एक तरफ जहां देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, वहीं गरीबों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है।
देश भर में पिछले कई वर्षों से विकास की चर्चा जोरों पर है। परंतु जब भी विकास की बात होती है, हर बार अमेरिकी मॉडल को ही अपनाने पर जोर दिया जाता है। हमारे देश के प्राकृतिक एवं विशाल मानव संसाधनों को ध्यान में रखकर कोई ठोस नीति नहीं बनाई जा रही, ताकि बेरोजगारी भी खत्म हो और खुशहाली भी आए। हमारे देश में उदारीकरण के दो दशकों के दौरान कैसा विकास हुआ है, उसकी असलियत ग्रामीण इलाकों में जाकर ही पता चलती है। मानव विकास सूचकांक एवं कुपोषण के मामले में हमारे देश की मौजूदा हालत सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। ग्रामीण इलाकों में बेशक मनरेगा जैसी कुछ योजनाओं के चलते चंद लोगों को रोजगार मिला है, लेकिन वह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है और भूख और बेरोजगारी को पूरी तरह खत्म करने में असमर्थ है।
हमारे यहां वास्‍तविक विकास तभी संभव हो पाएगा, जब देश के अंतिम व्‍यक्ति का हित सर्वोपरि रहे। यहां ऐसी नीतियों की जरूरत है, जिसमें देश के उस वर्ग का हित समाहित हो, जो देश का पेट भरने के लिए अनाज पैदा करता है। आज स्थिति यह है कि किसानों की जमीन छीनकर उद्योगपतियों को दी जा रही है। नतीजतन हमारा देश दो हिस्‍सों में बंट गया है। एक है, ऊंचे-ऊंचे मॉल, बड़ी-बड़ी इमारतें, शानो-शौकत और आधुनिकता से परिपूर्ण जीवन शैली वाला इंडिया, तो दूसरा है दीन-हीन भारत, जहां विवश किसान, गरीब मजदूर, उत्पीड़न के शिकार दलित, भूमि और आजीविका से बेदखल जनजातियां और शहरों की गलियों में भीख मांगते छोटे-छोटे बच्चे नजर आते हैं।
ऐसा नहीं है कि विकास की हमारी अपनी कोई नीति नहीं रही है। हमारी भारतीय संस्‍कृति में साथ-साथ रहने, खाने, जीने और आगे बढ़ने की शिक्षाएं दी जाती हैं। यानी विकास हो तो सभी के हित और सुख के लिए, न कि केवल कुछ खास लोगों और वर्गों के लिए। विकास के इस मॉडल में व्‍यक्ति के शारीरिक, मानसिक, आध्‍यात्मिक और सामाजिक विकास की अवधारणा समाहित है। लेकिन उदारीकरण के बाद के वर्षों पर नजर डाले, तो साफ महसूस होता है कि देश की इस विशेषता को लगातार खत्म करने की कोशिशें जारी हैं। बाजारवाद और वैश्‍वीकरण ने हमारे विचार, व्‍यवस्‍था और व्‍यवहार, तीनों में व्यापक परिवर्तन लाने की चेष्‍टा की। वर्तमान में लंबी-चौड़ी सड़कें, विशाल मॉल, एफडीआई से आने वाले धन, बढ़ती जीडीपी को ही विकास का मानदंड समझ लिया गया है। असल वात तो यह है कि सत्ता में बैठे लोग इसी को विकास मनवाने पर तुले हैं। परंतु यह टिकाऊ और संतुलित विकास नहीं है। असली विकास तो तब होता, जब चारों-ओर खुशहाली का माहौल होता और हर किसी के चेहरे की मुस्‍कान विकास का गुणगान करती दिखाई देती। शेयर बाजार का उछलना और विदेशी मुद्रा भंडार का बढ़ना विकास नहीं है।
अगर सरकार की ही बातों पर गौर करें, तो देश की लगभग 80 करोड़ जनता 20 रुपये रोजना पर गुजारा करती है। आखिर ऐसा क्यों है कि एक तरफ देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है, दूसरी तरफ गरीबों की संख्या में भी लगातार इजाफा होता जा रहा है। दरअसल यहां जो भी नीतियां बनाई जाती हैं, वे पूंजीपतियों एवं प्रभावशाली समूहों के हितों को ध्‍यान रखकर। यही वजह है कि आज आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी हुई है। इस खाई को पाटने के लिए एक समग्र विकास ढांचे की जरूरत है, जिसमें समाज के हर वर्ग को तवज्जो मिले और आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ देश की संस्कृति का भी खयाल रखा जाए। पहले व्‍यक्ति निर्माण, फिर परिवार निर्माण और उसके बाद समाज निर्माण के संकल्‍प के साथ जब आगे बढ़ा जाएगा, तभी राष्‍ट्र का निर्माण संभव है। इसके बाद ही वह दौर आएगा, जब विकास की बूंद उस अंतिम व्‍यक्ति तक पहुंचेगी, जो आम आदमी के नाम से जाना जाता है।
 8 अक्‍टूबर 2012 के अमर उजाला कांम्‍पेक्‍ट में  विकास के समग्र मॉडल पर चर्चा करता आलेख पढ़ें  http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20121008a_012108004&ileft=294&itop=67&zoomRatio=158&AN=20121008a_012108004

अक्टूबर 04, 2012

टेलीवीजन संस्कृति के दोहरे मानदंड


एक तरफ तो कलर्स चैनल भारतीयता का ढोंग करते हुए कई ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण करता है जिनमें भारतीय संस्कृति के गौरव की व्याख्या की जाती है। दूसरी और 'बिग बॉस' जैसे कार्यक्रम के माध्यम से उसी संस्कृति को धूल-धूसरित करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी जाती है। संस्कृति को तोड़ने और बचाने के इस दोहरे मापदंड में फायदा किसका है।
टेलीविजन चैनल 'कलर्स' पर दिखाए जाने वाले लोकप्रिय कार्यक्रम 'बिग बॉस' का आगाज 6 अक्टूबर से होने जा रहा है। ज्यादा से ज्यादा दर्शक बटोरने के लिहाज से इस कार्यक्रम का प्रसारण प्राइम टाइम में किया जाएगा। हमेशा की तरह इसमें ग्लैमर जगत की हस्तियां शिरकत करने जा रही हैं, हालांकि कार्यक्रम के होस्ट सलमान खान का कहना है कि 'बिग बॉस' का यह संस्करण पूर्णतया पारिवारिक होगा, लेकिन अब तक जिन लोगों के नाम इसके लिए गिनाए जा रहे हैं, उसे देखकर यह कहना मुश्किल है। दर्शक इस बार  'बिग बॉस' के घर में मॉडल से अभिनेत्री सयाली भगत, मैच फिक्सिंग की आरोपी नूपुर मेहता, सेक्स गुरू स्वामी नित्यानंद, अभिनेता आमिर खान के भाई फैजल खान, पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू, एंकर/अभिनेता जय भानुशाली को देख सकते हैं।कार्यक्रम में एक विदेशी मेहमान किम करदाशियां के आने संभावनाएं प्रबल हैं।
दर्शकों को याद होंगे 'बिग बॉस' के पिछले 5 संस्करण, जिनमें अश्लीलता और गाली-गलौज को लेकर हमेशा विवादों की स्थिति बनी रहीं। इसी शो के पांचवें संस्करण में भारतीय मूल की कनाडाई पोर्न स्टार सन्नी लियोन को जोरदार तरीके से पेश किया गया। इस स्टार के आने से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ स्कूलों और कॉलेजों में जाने वाला युवा वर्ग। इंटरनेट पर 'सन्नी लियोन' को सर्च करने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा।
इससे शो की टीआरपी बढ़ गई। रही सही कसर फिल्म 'जिस्म-2' ने पूर्ण कर दी। न तो केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के ओर से इस पर कोई आपत्ति जताई गई और न ही शो के होस्ट संजय दत्त और सलमान खान को इस पर ऐतराज़ हुआ। परिणाम यह हुआ कि शो के निर्माताओं ने टीआरपी बढ़ाने का फंडा तो खोज लिया लेकिन भारतीय संस्कृति की मर्यादा को तार-तार कर दिया। बीते कुछ सालों की बात करें तो टीआरपी के चक्कर में छोटे पर्दे के शोज बनाने वाले निर्माता सभी मर्यादाओं को ताक पर रखकर पैसों की खातिर संस्कृति के प्रति अपनी जवाबदेही भूलाकर अपसंस्कृति की शरण में चले जाते हैं। इसी कारण कल तक देश को साक्षरता, संस्कृ ति और जागरूकता का पाठ पढ़ाने वाला टेलीविज़न, अश्लीलता और नग्नता फैलाने का माध्याम बनता जा रहा है।
हम सबने 'बिग बॉस' के 5 संस्करण देखें, हर बार इसमें उन विवादित हस्तियों को लाने का प्रयास किया जाता है, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को कहीं न कहीं शर्मशार किया है, या फिर ऐसे लोगों को लाया जाता है जिनका कैरियर समाप्त हो चुका और इस शो के माध्यंम से उनके कैरियर को संजीवनी प्रदान करने की कोशिशें की जाती हैं, वो भी सांस्कृतिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर। अब प्रश्न यह उठता है कि एक तरफ तो कलर्स चैनल भारतीयता का ढोंग करते हुए कई ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण करता है जिनमें भारतीय संस्कृति के गौरव की व्याख्या की जाती है। दूसरी और  'बिग बॉस' जैसे कार्यक्रम के माध्यम से उसी संस्कृति को धूल-धूसरित करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी जाती है।
संस्कृति को तोड़ने और बचाने के इस दोहरे मापदंड में फायदा किसका है उन कॉरपोरेट घरानों का जो भारतीय संस्कृ ति को निरंतर बेच कर अपना पेट भर रहे हैं। इसे यहीं रोकना होगा, सरकार चुप है, दर्शक खुश तो संस्कृति को कौन बचाएगा। जब कला का पुजारी कलाकार ही नंगा नाच नचाने लगेगा तो, संस्कृति का क्षय तो निश्चित ही है। समय आ गया है कि कला और संस्कृति के पुजारियों को विवेक की कसौटी पर परख कर ही किसी कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए, अन्यथा सिर्फ पैसा कमाने के चक्कर के अपसंस्कृति हम पर इस कदर हावी हो जाएगी कि हमारी आने वाली पीढ़ी इसे देखकर हम पर शर्म करेगी। यही समय है कि सुधर जाएं और अपना तथा अपनी संस्कृ़ति का भविष्य उज्वल बनाएं। प्रत्येक संस्कृति के मूल में एक जीवन-दर्शन होता है। इसीलिए प्रत्येक कला के मूल में भी एक जीवन-दर्शन होता है। आवश्यक नहीं कि उसके प्रति कला सचेत भी हो; वह अंशत: या संपूर्णतया अवचेतन भी हो सकता है। पर उसका होना अनिवार्य है। कलाकार का विवेक उसी पर आश्रित है, उसी से उसके मूल्य या प्रतिमान नि:सृत होते हैं। कलाकार या साहित्यकार की शिक्षा अथवा संस्कार के कारण यह जीवन-दर्शन कम या अधिक चेतन हो सकता है।
स्‍टार समाचार सतना में प्रकाशित इस आलेख को आप  इस लिंक पर भी देख सकते हैं http://www.starsamachar.com/EpaperPdf/4102012/4102012-md-hr-6.pdf
लेखक देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार में व्याख्याता हैं।
संपर्क सूत्र- 0941062596

सितंबर 28, 2012

खोखली राजनीति ने किया देश का बंटाधार


सुबह-सुबह गंगा की सैर से लौटते समय एक बूढ़े चाय वाले की दुकान पर रूककर सोचा कि क्‍यों न चाय की चुस्कियों का लुत्‍फ उठाया जाये। लेकिन एक दृश्‍य देखकर अचंभित हो गया, चाय वाला लकड़ी जलाकर चाय बनाने का प्रयास कर रहा था। जो कभी एलपीजी की मौजूदगी में त्‍वरित गति से चाय बनाकर अपने ग्राहकों की सेवा किया करता था। इस व्‍यथा का कारण पूछने पर वह बोल पड़ा बेटा इस खोखली राजनीति ने देश का बंटाधार कर दिया। इससे तो अच्‍छे हम अंग्रेजों के शासनकाल में थे। वो कम से कम पराया होकर हमें लूटते थे। अब तो हमारे अपने ही हमें लूटने पर तूले हैं। सत्‍ता के लिए हर हमारे राजनेता रोज नया ड्रामा लेकर नचाते-कूदते नज़र आते हैं। देश में बंदरबांट मची है। गैस की सब्सिडी हटा दी सिलेंडर कहां से लाएं, अभी से ब्‍लैक में कीमत 1000 के पार चली गई, पहले से ही मुश्किल से गुजरा होता था। इतने में सब्‍जी बेचने वाली एक अम्‍मा जो सब्‍जी बेचकर अपने परिवार का पालन पोषण करती थीं, वहां से गुजरी, जो अपना बोरिया-बिस्‍तरा बांध कर वापस जा रही थीं, अपने गांव। मैं अक्‍सर उनसे ही घर के लिए सब्‍जी खरीदा करता था। कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वो एफडीआई के बारे में तो कम जानती थीं, लेकिन किसी ने उनको ये समझा दिया था कि विदेशी दुकानें अब अपना विस्‍तार करेंगी, आप लोगों का अब कोई काम नहीं बचा। इसलिए दुकान बंद करो और अपने घर लौट जाओ।
मैं सोच में डूब गया यह व्‍यथा केवल उस बूढ़े चाय बेचने वाले या बूढ़ी अम्‍मा की नहीं है। भारत का हर उस व्‍यक्ति की है जो किसी तरह अपने लिए दो जून की रोटी की व्‍यवस्‍था कर पाता है। ऐसे में भारत सरकार के इस तरह लिए गए फैसले कितने नीतिगत हैं, आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं। घोटालों ने तो पहले से ही भारत की कमर तोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। अब तो यह भी शंका उत्‍पन्‍न होने लगी है कि मंहगाई और एफडीआई जैसी चीजें समाने लाकर कहीं जनता का ध्‍यान बडे़-बड़े घोटालों से बटाने की कोशिश तो नहीं की जा रही हैं।
2014 का चुनावी माहौल अभी से अपना रंग दिखा रहा है, सरकार का यह बयान कि कांग्रेसी सरकार वाले राज्‍यों में 9 सिलेंडर सब्सिडी के दयारे में आयेंगे। ये कैसा बचपना है, इसे देखकर तो यही लगता है कि पूरे देश की मां हमारी सरकार बाकी राज्‍यों के साथ सौतेला व्‍यवहार कर रही है। सवाल यह है कि क्‍या जनता केवल कांग्रेसी सरकार वाले राज्‍यों में ही निवास करती है, बाकी राज्‍यों में क्‍या भूत रहते हैं। खैर जाने दीजिए इन बातों को ममता बनर्जी ने समर्थन तो वापस ले ही लिया है, अब सरकार का क्‍या होगा ये वही जाने, लेकिन एक बात तो साफ हो गई, राजनीति झूठों की बस्‍ती है। सरकार कह रही है कि ममता जी को सारे निर्णयों के बारे में बताया गया, लेकिन ममता जी इससे नकार रही हैं। ऐसे में किसको सत्‍यवादी माना जाए। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा सुप्रीमो मुलायम क्‍या रंग दिखाते हैं। दोनों यूपी में तो एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं, क्‍या केन्‍द्र में कांग्रेस के साथ इनका मेल खायेगा। अगर ऐसा होता है तो जनता यही समझेगी कि ये सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। या फिर सरकार गिरेगी और चुनावों के बाद फिर से मंहगाई का चाबुक इस देश उस दो तिहाई जनता पर चलेगा, जो अभी से घोटालों और मंहगाई के वार से पस्‍त हो चुकी है।
मैं इसी सोच में डूबा था कि वह गरीब बूढ़ा बड़ी मुश्किल से गरमागरम चाय लेकर आ गया, मैने चाय का आनंद लिया और अपने घर की ओर आगे बढ़ चला।

सितंबर 17, 2012

सोशल मीडिया पर अंकुश क्यों?


परिदृश्य
आदित्य शुक्ला
जिस तरह से देश में इंटरनेट का प्रसार बढ़ रहा है, सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाना ही होगा।

हमारे देश की एकता और अखंडता को कभी जातिवाद व सांप्रदायिकता के नाम पर, तो कभी आर्थिक विषमता के नाम पर चुनौती दी जाती रही है। राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम पर भी लोगों को भड़काने की कोशिशें लगातार होती रही हैं। लेकिन यह हमारे देश की सांस्कृतिक विशिष्टता ही है कि बहुलतावादी होने के बावजूद एकता का सूत्र कभी कमजोर नहीं हो पाता है। असम में हाल ही में भड़की हिंसा के दौरान सोशल मीडिया पर अफवाहों का ऐसा दौर चला कि देश के विभिन्न हिस्सों से पूर्वोत्तर के लोग अपनी रोजी-रोटी छोड़कर पलायन करने लगे। नतीजतन सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिशें तेज हो गईं। लेकिन इससे देश भर में राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है।

असम की हिंसक घटनाओं को रोक पाने में विफल रहने के चलते जहां एक ओर सरकार की छीछालेदर हो रही है, वहीं सोशल मीडिया की छवि भी खराब हुई है। लेकिन इस पर अंकुश लगाने की कोशिशों से लोगों के बीच यह संदेश गया कि अपनी विफलता छिपाने के लिए सरकार सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की बात कर रही है। असल में जिस समय अन्ना हजारे का आंदोलन अपने चरम पर था, उस समय सोशल मीडिया ने सरकार के खिलाफ एक मोरचा ही खोल दिया था। तभी से सरकार लगातार यह कोशिश करती रही है कि सोशल मीडिया पर किसी भी तरह से प्रतिबंध लगाया जाए। यह सच है कि राष्‍ट्र की सुरक्षा की सुरक्षा सर्वोपरि है, परंतु इसकी आड़ में सरकार के भ्रष्‍ट तंत्र के खिलाफ मोरचा खोलने वाले सोशल मीडिया के नियमन को मंजूर नहीं किया जा सकता है।
हम सभी जानते हैं कि सोशल मीडिया महज अफवाह फैलाने का तंत्र नहीं है, बल्कि इसमें सृजनात्‍मकता का मंत्र भी समाहित है। यहां न तो प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया जैसा संपादकीय नियंत्रण है और न ही कंटेंट पर कैंची चलने का खतरा। यह एक ऐसा माध्‍यम है, जिसने उस जनता को आवाज दी है, जो किसी न किसी कारण से अब तक चुप रहकर सरकारी तंत्र के तमाशे को देखा करती थी। सोशल मीडिया के उपभोक्ताओं में जहां जिम्मेदार पत्रकार, रचनाकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, वहीं साइबर अपराधी, जासूस, आतंकवादी, कट्टरपंथी भी। यही वजह है कि आज सरकार को इसके नियमन का बहाना मिल गया है। इससे कोई इनकार नहीं कि इस मीडिया का कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व लगातार दुरुपयोग कर रहे हैं और देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु सोशल मीडिया के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आज़ादीके मुद्दे को थोड़ा अलग ढंग से देखे जाने की जरूरत है। सोशल मीडिया उस आईने की तरह है, जो सरकारी तंत्र के बुरे पक्षों को भी उजागर करता है। इसलिए लोग इसके नियमन से सहमत नहीं दिखते। परंतु इतना तो स्‍पष्‍ट है कि मौजूदा स्थिति में संतुलन बिठाने और राष्‍ट्र की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए कुछ ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। जनसंख्‍या के लिहाज से हमारे देश के मात्र 10 प्रतिशत लोग ही इंटरनेट का इस्‍तेमाल करते हैं। इंटरनेट के प्रसार के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है। स्‍पष्‍ट है कि जैसे-जैसे इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्‍या में इजाफा होगा, साइबर अपराध भी तेजी से बढ़ेगा। ऐसे मेंे साइबर अपराध को रोकने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाना ही होगा, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने को उचित नहीं माना जा सकता। पूर्वोत्तर की घटनाएं एक चेतावनी है। इसके अलावा सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों को भी स्व-नियमन का तरीका अपनाना होगा। राष्ट्र की सुरक्षा के मद्देनजर सोशल मीडिया के उपभोक्ता अगर स्व-नियमन का तरीका अपनाएं, तो मुट्ठी भर साइबर अपराधियों पर नकेल कसना कोई बड़ी बात नहीं है।
काम्‍पेक्‍ट अमर उजाला में 17 सितम्‍बर को प्रकाशित आलेख : http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20120917a_012108003&ileft=294&itop=58&zoomRatio=156&AN=20120917a_012108003

अगस्त 17, 2012

देश के बचपन पर तस्करों की नजर

 मासूस बचपन पर, जिस पर राष्‍ट्र का भविष्‍य निर्भर करता हो, अपहरणकर्ताओं और तस्‍करों की नजर लग जाए, तो मानना चाहिए कि राष्‍ट्र की सुरक्षा खतरे में है। अपना देश वर्तमान में इसी खतरे से दो-चार हो रहा है। यहां के बचपन को सुरक्षा की दरकार है। सरकार भले ही लाख दावा करे कि वह बच्‍चों की सुरक्षा के लिए भरसक प्रयास कर रही है, लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आकड़ें इन दावों की पोल खोल रहे हैं। एनसीआरबी के मुताबिक, बीते तीन वर्षों में 1.84 लाख बच्‍चे लापता हो गए। इनमें से 28,595 बच्‍चे अपहरणकर्ताओं का शिकार बने। एनसीआरबी की रिपोर्ट यह भी कहती है कि देश में लगभग 96 हजार बच्‍चे हर साल लापता हो रहे हैं, यानी हर घंटे, लगभग 11 बच्‍चे। इन बच्‍चों में 70 फीसदी की उम्र होती है, 12 से 18 साल। आखिर इतने बच्‍चे जाते कहां हैं? जवाब मुश्किल नहीं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ‘ट्रैफिकिंग इन वूमेन ऐंड चिल्ड्रन इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट को मानें, तो बच्चों की तस्करी को रोकने के प्रयास नाकाफी हैं और इनमें मौजूद खामियों का फायदा उठाकर तस्‍कर बच्‍चों को उठाने में कामयाब हो जाते हैं।
दुखद है कि सरकार इन मासूमों की सुध नहीं लेती। असल में ये बच्‍चे सरकार के राजनीतिक दबाव समूह से नहीं आते। इस वजह से केंद्र और राज्‍य सरकारें उन पर गौर करना ही नहीं चाहती। इन बच्‍चों की तस्‍करी उन राज्‍यों में अधिकाधिक होती है, जहां गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सरकारी तंत्र की भ्रष्‍टता चरम पर है। इनमें राजस्‍थान, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, हरियाणा एवं असम जैसे पूर्वोत्तर के राज्‍य भी शामिल हैं। दुखद है कि इन बच्चों के गायब होने के एफआईआर तक नहीं लिखी जाती। इनमें से ज्‍यादातर बच्‍चे उन गरीब परिवारों से ताल्‍लुक रखते हैं, जिनके मां-बाप को दो जून की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इनमें दिल्‍ली टॉप पर है, जो बच्‍चों के खिलाफ हुए क्राइम के मामले में सर्वाधिक हिस्‍सेदारी रखता है। इन बच्‍चों में ज्‍यादातर को वेश्यालयों, कारखानों या धनी परिवारों में बेच दिया जाता है। इसके अलावा होटलों, ईंट भट्ठों में भी बिना दिहाड़ी के ये बच्चे रात-दिन काम करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। दुर्भाग्य से अभी तक सरकार ने बच्‍चों के अपहरण और तस्‍करी रोकने के लिए जो भी कानून बनाए हैं, वह मजबूत नहीं दिखता। इसके अलावा जो संस्‍थाएं बाल हितों को लेकर काम कर रही हैं, वे भी इन कुकृत्‍यों को लेकर कभी विशेष चिंतित नहीं रहती हैं। दूसरी बात समाज के जिस वर्ग के बच्‍चों पर यह संकट सर्वाधिक है, हमारा समाज भी उसके प्रति संवेदना नहीं रखता। इसलिए गरीबों के बच्‍चों के लिए न तो संसद में हंगामा होता है और न ही पुलिस उन्‍हें ढूंढने में दिलचस्‍पी दिखाती है।
बीते कुछ वर्षों पर गौर करें, तो बाल तस्‍करी, बाल अपहरण और बाल अपराध ने एक उद्योग का रूप ले लिया है। विदेशों में बच्‍चों को मनोरंजन के साधन के रूप में इस्‍तेमाल किया जाने लगा है। अरब देशों से आने वाली खबरें इसका प्रमाण हैं कि वहां शेखों के मनोरंजन में भारतीय बच्‍चों का इस्‍तेमाल किया जाता है। इन अमानवीय क्रूरताओं के खिलाफ न तो केंद्र सरकारें आवाज उठाती हैं, और न ही मानवाधिकार से जुड़े लोग।
तथ्य यह है कि पूरी दुनिया में बाल अधिकारों से जुड़ी कई संस्‍थाएं काम कर रही हैं। उन्हें सशक्‍त बनाने के लिए लाखों योजनाएं चल रही हैं और अरबों-खरबों रुपये भी खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन जब बात बच्‍चों से जुड़े अपराधों से लोहा लेने की आती है, तो आखिर समाज का हर वर्ग चुप्‍पी क्‍यो साध लेता है? क्‍या जो बच्‍चे इन अपराधों का शिकार बने, वे समाज का अंग नहीं हैं? इन प्रश्‍नों का हल सभी को खोजना होगा। हर किसी को जीने का हक है। उन मासूमों को भी जिन्‍हें हर रोज धकेला जा रहा है अमानवीयता के उस दलदल में, जहां की जिंदगी नरक से भी बदतर है। इसलिए चुप्‍पी तोड़ उन मासूमों को बचाने का प्रयास करें, जिनकी पनियाती आंखें सुरक्षा की बाट जोह रही हैं।
अमर उजाला कांम्‍पेक्‍ट में प्रकाशित आलेख : http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20120817a_01210a003&ileft=294&itop=67&zoomRatio=158&AN=20120817a_01210a003

जुलाई 16, 2012

इक्कीसवीं सदी का यह चेहरा


पिछले कुछ ही दिनों में हुई विभिन्न घटनाओं से एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर इस देश में महिलाएं कहां सुरक्षित हैं!
शायद ही किसी ने विकसित होते भारतीय समाज के इस भयावह तसवीर की कल्‍पना की होगी। कुछ ही दिनों के भीतर हुई घटनाओं, असम में एक लड़की के साथ अमानवीयता, लखनऊ के थाने में एक महिला के साथ बलात्कार की कोशिश, बागपत में खाप पंचायत का चिंतित करने वाला फरमान, विश्‍व भारती में पांचवीं कक्षा की छात्रा को पेशाब पिलाने की सजा, पश्चिम बंगाल में क्‍लास में एक बच्ची को नंगा किए जाने जैसी घटनाओं से लगता है कि देश कई सदी पीछे की ओर छलांग लगा चुका है। आधी आबादी की यह दुर्गति शर्मनाक ही नहीं, समाज के चेहरे पर काला धब्बा भी है। इन घटनाओं ने समाज, सत्ता-व्यवस्था, पुलिस-प्रशासन और मीडिया सबको बेनकाब कर दिया है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज भी कुछ लोग महिलाओं के खिलाफ हुई इन घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए हैं।
गुवाहाटी की घटना ने पूरे देश को शर्मसार किया है। अकेली लड़की के साथ आधे घंटे तक अमानवीय व्यवहार करने वाले लड़के तो दोषी हैं ही, घटना को मूक दर्शक बनकर देखते रहने वाले लोग भी कम गुनहगार नहीं हैं। मीडिया द्वारा उस वीडियो क्लिंपिंग का बार-बार प्रसारण भी कम शर्मनाक नहीं है। अगर वहां मीडियाकर्मी मौजूद थे, तो उन्हें लड़की को बचाने की कोशिश करनी चाहिए थी। क्या मीडिया का सरोकार आज केवल किसी सनसनीखेज घटना का प्रसारण कर टीआरपी बटोरना ही रह गया है? दरअसल यह हमारे समाज के पतन का सुबूत है। हमारे समाज में आज भी पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता हावी है, जिसके लिए महिलाओं के सम्मान का कोई मूल्य नहीं है।
उत्तर प्रदेश में युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार बनने से लोगों में उम्मीद बंधी थी कि अब प्रदेश की शासन-व्यवस्था में सुधार आएगा, लेकिन लोगों की यह उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है। बागपत में महिलाओं के खिलाफ खाप पंचायत का अलोकतांत्रिक फरमान और लखनऊ में थाने में ही एक महिला की इज्जत पर धावा साफ दर्शाता है कि मौजूदा प्रदेश सरकार कानून व्यवस्था को सुधारने में विफल साबित हो रही है। लेकिन केवल सरकार को ही दोष क्यों दें, सहारनपुर के सरसांवा में तो एक लड़की की इज्जत घर में भी महफूज नहीं रही। एक बार फिर यह सवाल उठता है कि आखिर हमारे देश में एक महिला कहां सुरक्षित है। न घर, न बाहर, न स्कूल में और न ही सरकारी थाने में। क्या विद्रूप है कि जिन शिक्षकों को बच्चों के भविष्य का निर्माता बनना था, उन्होंने ही बच्चियों के भविष्य को तार-तार कर उन्हें ऐसा गहरा जख्म दिया, जिनसे उबर पाना उनके लिए मुश्किल होगा। समाज का दानवी चेहरा दिखाने वाली ये घटनाएं बताती है कि हमारा देश वाकई कायरों और कूपमंडूकों का देश बन गया है।
क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो के आंकड़ों की मानें, तो बीते वर्ष 2011 में महिलाओं के प्रति हुए कुल 2,28,650 अपराध दर्ज किए गए। जिसमें अपहरण के 35,565, छेडछाड़ के 42,968, यौन उत्‍पीड़न के 8,570, सगे-संबंधियों द्वारा अमानवीय व्‍यवहार के 99,135 एवं लड़कियों की खरीद-फरोख्‍त के 80 मामले शामिल हैं। 1971 से 2011 तक बलात्‍कार के मामलों में 873.3 फीसदी (1971 में 2,487, जबकि 2011 में 24,206 मामले) की वृद्धि दर्ज की गई। ये सरकारी आंकड़े हैं, वास्तविक स्थिति इससे कहीं भयानक है। आर्थिक महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाले देश में महिलाओं के खिलाफ बेकाबू होता अपराध किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है।
जिस देश की बेटियां आज दुनिया भर में नाम रोशन कर रही हैं, वहां ऐसी विकृतियां शोभा नहीं देतीं। अगर हमें अपनी बहन-बेटियों के सम्मान की रक्षा करनी है, तो उसके सम्मान को चोट पहुंचाने वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाने ही होंगे। इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और महिलाओं का सम्मान करना सीखना होगा। क्या हम तैयार हैं! 
काम्‍पेक्‍ट अमर उजाला में प्रकाशित आलेख, लिंक देखें-


जुलाई 08, 2012

जून 15, 2012

तालाबों की कब्र पर खड़ी होती इमारतें


पनघट और पनिहारिनों का बहुत पुराना रिश्ता है, लेकिन बदलते दौर में यह रिश्‍ता खत्‍म हो गया है। अब न तो पनिहारिनों के गीतों की धुनें सुनाई देती हैं और न ही कहीं तालाब दिखते हैं। अब तो पानी के लिए लोगों को मीलों भटकना पड़ता है। कभी जिन तालाबों का सरोकार आमजन से हुआ करता था, उन तालाबों की कब्र पर अब हमारे भविष्‍य की इमारतें तैयार की जा रही हैं। ये तालाब हमारी प्‍यास बुझाने के साथ-साथ खेत-खलिहानों की सिंचाई के माध्यम हुआ करते थे। एक आंकड़े के अनुसार, मुल्‍क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। बरसात का पानी इन तालाबों में इकट्ठा हो जाता था, जो भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी होता था। तुलसीदास कृत रामचरित मानस में भी जिक्र आता है, सिमट-सिमट जल भरहिं तलावा, जिम सद्गुण सज्‍जन पहिं आवा। इन तालाबों की वजह से किसानों को सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था और वह समय पर खेतों की सिंचाई कर लिया करता था। तालाबों के बारे में पर्यावरणविद अनुपम मिश्र अपनी पुस्‍तक आज भी खरे हैं तालाब में कहते हैं, ये सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्‍य से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों, तो दहाई थी बनाने वालों की, यह इकाई, दहाई मिलकर, सैकड़ा, हजार बनता था। पिछले दो सौ वर्षों में नए किस्‍म की थोड़ी-सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्‍य बना दिया।
लंबे अंतराल बाद पिछले दिनों अपने गांव जाने का अवसर मिला। चार दिनों की इस यात्रा में सब कुछ सुखद रहा है, लेकिन एक बात ने दिल को बुरी तरह झकझोर दिया। ग्रामीण इलाकों में तालाबों को पाटने का सिलसिला देखकर यह सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर हम किस तरह के विकास पथ पर आगे बढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर और बरेली जिलों में आजादी के समय लगभग 182 तालाब हुआ करते थे। उनमें से अब महज 20 से 30 तालाब ही बचे हैं। जो बचे हैं, उनमें पानी की मात्रा न के बराबर है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्‍ली में अंगरेजों के जमाने में लगभग 500 तालाबों के होने का जिक्र मिलता है, लेकिन कथित विकास ने इन तालाबों को लगभग समाप्‍त ही कर दिया।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने नए तालाबों का निर्माण तो नहीं ही किया, पुराने तालाबों को भी पाटकर उन पर इमारतें खड़ी कर दीं। भू-मफियाओं ने तालाबों को पाटकर बनाई गई इमारतों का अरबों-खरबों रुपये में सौदा किया और खूब मुनाफा कमाया। इस मुनाफे में उनके साझेदार बने राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी। माफिया-प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की इस जुगलबंदी ने देश को तालाब विहीन बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। नतीजतन देश भर में तालाबों की संख्‍या 80 हजार के आसपास ही रह गई। यह तो सरकारी आंकड़ों की जुबानी है, इसमें कितनी सचाई है, यह किसी को नहीं पता। सरकार ने मनरेगा के तहत फिर से तालाब बनाने की योजना का सूत्रपात किया है। अरबों रुपये खर्च हो गए, लेकिन वास्तविक धरातल पर न तो तालाब बने और न ही पुराने तालाबों का संरक्षण ही होता दिखा।
गुजरते वक्‍त के साथ तालाबों को दम तोड़ते देखा जा सकता है। सवाल उठता है कि आखिर यह कैसा विकास है, जो हमारे पर्यावरण के साथ खुलेआम खिलवाड़ कर रहा है और भावी पीढ़ी के जीवन के लिए संकट पैदा कर रहा है। जहां तालाब होते हैं, वहां का भूजल स्तर बेहतर होता है और फसलों को भी पर्याप्त पानी मिलता रहता है। लेकिन अब न तो वह दौर है, न ही तालाब बनवाने वाले वे लोग। बेशक अब वह दौर नहीं लौट सकता, पर तालाबों के संरक्षण और निर्माण को फिर शुरू तो कर सकते हैं। 
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