मध्यप्रदेश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मध्यप्रदेश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

जनवरी 22, 2018

मध्यप्रदेश में काँग्रेस चलेगी बीजेपी की राह....

मध्य प्रदेश का चुनाव कई मायनों में बड़ा होगा। क्योंकि सभवतः नवम्बर 2018 में मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों पर होने वाला यह चुनाव लोकसभा के चुनावों से तुरंत पहले होगा या फिर लोकसभा चुनावों के साथ ही सम्पन्न हो। ऐसे में प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं। एक तरफ जहां विगत 15 सालों से प्रदेश में बीजेपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ‘एकात्म यात्रा’ के सहारे वोटों को रिझाने का काम कर रहें हैं वहीं दूसरी काँग्रेस गुजरात से लेकर आए ‘नरम हिन्दुत्व’ के सहारे इस और कदम बढ़ा रही है। ये सब तो ठीक है। मंदिर-मस्जिद जाना वोटों को अपने पक्ष मे करने का पुराना तरीका है। वर्तमान में देखें तो मध्यप्रदेश की विधानसभा में 165 सीटें बीजेपी, 58 काँग्रेस, 4 बहुजन समाजवादी पार्टी और 3 सीटें निर्दलीय विधायकों के पास हैं। ऐसे मे कॉंग्रेस के लिए बहुमत के आंकड़े तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है और बीजेपी के लिए चुनौती है अपनी सीटें बचाने की। हालांकि 20 जनवरी को निकाय उपचुनावों में बीजेपी को झटका लगा है और पार्टी को 5 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। वही काँग्रेस ने 5 सीटें अधिक जीतकर अपने होने का एहसास प्रदेश बीजेपी को करवाया है।
काँग्रेस निकाय उपचुनाव सुखद अनुभूति लेकर आए हैं लेकिन पार्टी का पेंच उलझता है वहाँ आकार, जब वो अपने लिए मुख्यमंत्री पद के एक अदद चेहरे की तलाश करते हैं। क्योंकि पार्टी अधिकांश कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के चेहरे की जल्द घोषणा के पक्ष में हैं, और इस क्रम में ग्वालियर के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम कई बार सामने आया है। लेकिन अभी तक काँग्रेस का कोई भी पदाधिकारी इस पर खुल कर बोलने को तैयार नहीं है। इसके अलावा कमलनाथ का नाम भी की कई लोगों की जुवान पर है। दोनों पक्षों के लोग दिल्ली यानि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी तक अपनी बात पहुँचने और अपने पक्ष में समीकरण साधने कि पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।
वहीं काँग्रेस पार्टी कुछ बड़े नेता बिना चेहरे के चुनाव लड़ने की रणनीति के पक्षधर हैं। इनकी माने तो पार्टी में अभी इसके लिए मंथन चल रहा हैं, परंतु अभी कुछ भी निर्धारित नहीं है। काँग्रेस विधायक दल के नेता अजय सिंह नाम न घोषित करने के पक्ष में हैं उनकी दलील है कि 1956 से जब से मध्य प्रदेश का गठन हुआ है तब से मुख्यमंत्री के नाम के पूर्व घोषणा उनकी परंपरा में नहीं है। ऐसे में सब कुछ अभी अधपका सा लग रहा है। लेकिन अंदर के सूत्रों कि माने तो पार्टी इस मामले में फूँक-फूँक कर कदम रख रही है और साथ ही बीजेपी द्वारा उत्तर प्रदेश मे अपनाए गए फॉर्मूले को अपनाने पर विचार कर रही है। इसके साथ ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को नए पन और नए अध्यक्ष और नए बदलावों का एहसास करने के लिए ये भी कहा गया है कि टिकट को लेकर जो भी निर्णय होगा वो भोपाल में ही होगा कोई भी इस काम के लिए दिल्ली नहीं जाएगा। पार्टी के नियमों को तोड़ने पर कार्रवाई कि भी बात भी की जा रही है।
आपको याद होगा बीजेपी ने उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले मुख्यमंत्री पद के लिए कई दावेदारों कि खबरें मीडिया कि सुर्खियां बनी और आखिर में अब बीजेपी भारी बहुमत से चुनाव जीत गई तब लीक से हटकर योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुखिया बनाया गया। काँग्रेस भी इसी फॉर्मूले पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि जीतने ज्यादा लोगों के चेहरे के साथ चुनाव लड़ा जायेगा उतने ज्यादा लोगों के समर्थकों का साथ मिलेगा और पार्टी चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेगी। जिस तरह उत्तरप्रदेश में बीजेपी को इस रणनीति का फायदा मिला था। हालांकि इसका नुकसान भी है, मान लेते हैं कि पार्टी किसी तरह बहुमत के स्तर तक पंहुच जाती है, जिसकी संभावना कम है, तो क्या अंत में पार्टी के लोग उत्तर प्रदेश में बीजेपी कि तरह संयम दिखा पाएंगे। ऐसे में काँग्रेस के लिए यह मुश्किल खड़ी हो सकती है, मुख्यमंत्री किसको बनाए? और राजनीतिक समीकरणों को किस तरह से साधें। फिलहाल तो ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम इसमें सबसे ऊपर है, उसके बाद नंबर आता है कमलनाथ का। परंतु यदि काँग्रेस बीजेपी कि राह पर चल निकलती है तो फिर क्षेत्रीय, जातीय और प्रादेशिक समीकारणों को साधने वाले कई और नाम भी इस लिस्ट में जुड़ेंगे। ये देखने वाली बात होगी कि काँग्रेस आगामी चुनावों में इस रणनीति का बीजेपी कि तरह फायदा ले पाती है या फिर नुकसान उठाती। 
यह आलेख आप मध्य प्रदेश जनसंदेश के 22/01/2018 के अंक में भी पढ़ सकते हैं। 

अक्टूबर 14, 2016

कुपोषण और भूख से जूझता देश

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रत्येक वर्ष जारी होने वाले वैश्विक भूख सूचकांक की ताजा रिपोर्ट में भारत भूख से हारता दिख रहा है। एक बार फिर भूखमरी और कुपोषण की बदहाली भारत के थोथे विकास को आईना दिखा रही है। सूची में शामिल 118 देशों की सूची में 28.5 अंकों के साथ भारत 97वें स्थान पर है। जो पिछले वर्षों के आंकड़ों से बदतर है। विश्व में सर्वाधिक तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का यह हाल देखकर लगता है कि भारत अपने देश के लोगों को भोजन देने में असमर्थ है। अगर अभी यह हाल है तो आने वाले 10 सालों में जब भारत की जनसंख्या विश्व में सबसे ज्यादा होगी तो यह स्थिति और भी अधिक बदतर हो जायेगी।
वैश्विक भुखमरी सूचकांक विश्व के विकासशील देशों में भुखमरी तथा कुपोषण की गणना एवं इसके तुलनात्मक अध्ययन हेतु एक बहुआयामी सूचकांक है। इस सूचकांक को अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थानद्वारा दो गैर-सरकारी संगठनों वेल्ट हंगर हिल्फ’  और कंसर्न वर्ल्ड वाइडकी सहायता से प्रति वर्ष प्रकाशित किया जाता है। इस सूचकांक को गत वर्ष तक तीन संकेतकों अल्पपोषण’, ‘बाल अल्पवजन’  एवं बाल मृत्यु दर’, के आधार पर तैयार किया गया था किंतु वर्ष 2016 के वैश्विक भुखमरी सूचकांक को चार संकेतकों अल्पपोषण’, ‘लंबाई के अनुपात में कम वजन अर्थात बाल दुबलापन’ , आयु के अनुपात में कम लंबाई अर्थात बाल ठिगनापनतथा बाल मृत्यु दरके आधार पर तैयार किया गया है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक 100 आधार बिंदुओं के पैमाने पर तैयार किया जाता है जिसमें शून्य सबसे अच्छा स्कोर माना जाता है अर्थात कोई भूखा नहीं जबकि 100 सबसे खराब स्कोर होता है जिसमें सभी भुखमरी की स्थिति में हैं। यह दोनों ही स्थितियां व्यवहार में नहीं पाई जाती हैं। व्यवहार में  जीरो से 100  के बीच की स्थिति पाई जाती है। इस सूचकांक में कम मान’  देश की अच्छी स्थिति को दिखाता है, वहीं अधिक मानदेश में भुखमरी की भयावहता को प्रदर्शित करता है। रिपोर्ट भारत के लिए संतोषजनक नहीं हैं। क्योंकि उसे गंभीर देशों की श्रेणी में रखा गया है। भारत में 39 फीसदी बच्चे बौने तथा कुपोषण के शिकार हैं। पड़ोसी देशों से तुलना करें तो भारत की स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश से बहुत थोड़ी अच्छी है। इनसे वह दोचार पायदान ऊपर है। जबकि श्रीलंका और नेपाल से बहुत पीछे है। यही नहीं, भारत अफ्रीका के गरीबी से जूझ रहे कई देशों से भी बहुत पीछे है। इस सूची में चीन का स्थान तीसवां है और वह हमसे 67 पायदान ऊपर हैं।
यह पहली रिपोर्ट नहीं है जिसने भारत के विकास की पोल खोली है। इससे पूर्व भी संयुक्त राष्ट संघ की 2014—15 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 20 लाख लोग भूख के शिकार थे। अगर अर्थशास्त्रियों की माने तो इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण बेरोजगारी है। यह सर्वविदित है कि भारत ने शिक्षा के स्तर पर अभूतपूर्व सफलता हासिल की लेकिन जिन लोगों को शिक्षित किया उन्हें रोजगार देने में सरकारें विफल रहीं। स्टार्ट अप इंडिया और मेक इन इंडिया के माध्यम से मोदी सरकार ने कुछ प्रयास किया लेकिन वह नाकाफी ही नज़र रहा है। लेबर ब्यूरों के आंकड़ों की बात करें तो देश का 2014—15 में बेरोजगारी रेट पिछले पांच वर्षों की तुलना में सबसे ज्यादा रहा।
अगर इस वैश्विक भूख सूचकांक कुल जनसंख्या में कुपोषणग्रस्त लोगों के अनुपात, पांच वर्ष से कम उम्र वर्ग में सामान्य से कम वजन के बच्चों की संख्या और पांच साल से कम आयु के बालकों की मृत्युदर के आधार पर बनता है।
इसमें भारत की स्थिति बिगड़ने की अहम वजह पांच साल तक के बच्चों में कुपोषण रहा। इसका कारण मध्याह्न भोजन, एकीकृत बाल विकास, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और मनरेगा जैसे कार्यक्रम और योजनाएं का सही ढंग से लागू हो पाना ही रहा होगा। मनरेगा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाओं को छोड़ दें तो अन्य योजनाएं दशकों से लागू हैं। तब इनके सार्थक सकारात्मक परिणाम मानव प्रगति सूचकांक से जुड़ी पिछली रिपरेटों में क्यों नजर नहीं आते? इसका अर्थ है जमीनी स्तर पर अभी भी कोर कसर बाकी है या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भारत को वैश्विक स्तर पर यह सब देखना पड़ता है। अगर भारत के राज्यों की बात करें तो एक रिपोर्ट के अनुसार यहां मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार सबसे ज्यादा खराब स्थिति वाले राज्य हैं।

दक्षिण एशिया में सबसे तेज बढ़ने वाले देश की इस स्थिति को देखकर लगता है कि कहीं विकास की झूठी कहांनियां तो नहीं गढ़ी जा रही। ऐसे में राजनेताओं को जीडीपी दर से भी आगे उठकर जमीनी स्तर पर जाकर देश की स्थिति को समझना होगा। तभी देश में गरीबी, बेरोजगारी और कुपोषण की स्थिति का सही आंकलन किया जा सकता है। नहीं तो वैश्विक स्तर की इन रिपोर्टों में देश यूं ही भूख से हारता रहेगा।

यह लेख दैनिक जनसंदेश मध्यप्रदेश में 14 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित हुआ।