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जनवरी 07, 2020

दिल्ली का दंगल, किसका होगा मंगल?

Source: https://economictimes.indiatimes.com/img/73131081/Master.jpg
सोमवार को चुनाव आयोग ने दिल्ली के दंगल का तिथियां निर्धारित कर दीं। 8 फरवरी को दिल्ली में 70 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले जायेंगे। 11 फरवरी को चुनाव परिणाम आना है, जोकि मंगलवार है। ऐसे में ये चुनावी दंगल किसका मंगल करेगा ये देखने वाली बात होगी। कुछ चैनलों के पोल ने आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत की सरकार दे दी है। ये आप के लिए राहत की बात है, वहीं बाकी पार्टियों के लिए एक माह बचे समय में ठीकठाक परिणाम देने का  बोझ। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों और दिल्ली से सटे राज्य, हरियाणा के विधानसभा चुनावों की बात करें तो आम आदमी पार्टी की स्थिति ठीक नहीं रही है।
यह चुनाव कई मायनों में बड़ा होगा। आम आदमी पार्टी के लिए यह पांच साल किए गए कामों का परिणाम होगा वहीं बीजेपी के लिए नागरिकता संसोधन कानून में बदलाव के बाद के सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट, क्योंकि इस बदलाव के बाद इसका विरोध दिल्ली में ही शुरू हुआ। जामिया के विद्यार्थिंयों के सहारे इसे विपक्षी पर्टिंयों ने इस विरोध को खूब भूनाने का प्रयास किया। यहीं से पूरे देश में विरोध की आग फैली जो अबतलक जारी है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेंस के नेताओं पर दिल्ली में हिंसा भड़काने का आरोप भी इस दौरान लगा। ​दिल्ली के उप—मुख्यमंत्री और मौजूदा शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया सोशल मीडिया पर पुलिस पर आग लगाने के झूठे आरोप लगाते भी नज़र आये। ​चुनाव घोषणा से ठीक एक दिन पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ लेफ्ट और राइट बवाल भी इस चुनाव में मुद्दा होने वाला है।
पिछली बार की तरह भ्रष्टाचार इस बार आम आदमी पार्टी के लिए मुद्दा नहीं दिखता। पार्टी विकास के नारे के साथ चुनाव मैदान में है। शिक्षा और स्वास्थ्य के दिशा में किए गए प्रयासों के सहारे मौजूदा मुख्यमंत्री केजरीवाल की पार्टी अक्रामकता का रूख त्याग करते हुए, अपनी छवि को ठीक करने का प्रयास कर रही है। उनके प्रवक्ता भी टीवी चैनलों में संतुलित नज़र आ रहे हैं। हालांकि सवाल कई हैं प्रवक्ताओं को जिनका जबाव देते नहीं बनता।
गृहमंत्री अमित शाह के हालिया बयान के बाद ​एक बार फिर माना जा रहा है कि बीजेपी का एक ही सहारा हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रवाद। ये बीजेपी के​ लिए कैसा साबित होगा ये तो चुनाव परिणाम की बतायेंगे। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में बीजेपी की स्थिति ठीक नज़र नहीं आ रही। मुख्यमंत्री पद के लिए कोई भी चेहरा न दे पाने के कारण और सही समय पर निर्णायक स्थिति में न पहुंच पाने के कारण पिछले विधानसभी चुनावों में बीजेपी का हश्र क्या हुआ था यह लोग बाखूबी जानते हैं। इस बार भी परिस्थितियां पिछले चुनावों जैसी ही दिख रही है।

जुलाई 21, 2017

कुछ सवाल जो कचोटते हैं!

1. देश में हुई हालिया घटनाओं के विरुद्ध प्रतिरोध के स्वर केवल एक धर्म विशेष को ही लेकर क्यों उठते हैं, उनमें किसी और धर्म को क्यों शामिल नहीं होता। जैसे नॉटआॅनमाईनेम में पंडित आयूब की हत्या, डॉ नारंग की हत्या, केरल में लगातार हो रही पॉलिटिकल हत्याओं, पश्चिम बंगाल में हो रही हत्याओं को शामिल क्यों नहीं किया गया।
2. अगर आरएसएस और बीजेपी से स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता के प्रश्न पूछे जाते हैं तो वामपंथियों और बाकी पार्टियों से क्यों नहीं पूछे जाते। उनसे 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का साथ न देने और 1962 में चीन का समर्थन करने की वजह पूछने की हिम्मत कोई क्यों नहीं कर पाता।
3. धर्म परिवर्तन कर रहे लोगों से क्या कभी ये पूछा जाता है कि धर्म परिवर्तन के बाद उन्होंने आरक्षण का लाभ लेना क्यों नहीं बंद किया।
4. अगर गोधरा और बावरी पर पर प्रश्न किया जाता है तो 1982 के सिख दंगों और कश्मीरी पंडितों के खात्मे, असम के दंगों पर सवाल क्यों नहीं उठाये जाते।
5. "सामाजिक न्याय" का तर्क है कि "दलितों" पर "सवर्णों" ने ऐतिहासिक रूप से अन्याय किए, अतएव वर्तमान में न्याय की प्रविधियां दलितों को सुख, सुविधा और संरक्षण मुहैया कराएं!
किंतु अगर "सामाजिक न्याय" से पूछा जाए कि हिंदुओं पर मुसलमानों द्वारा ऐतिहासिक रूप से जो अन्याय और अत्याचार किए गए हैं, उनकी न्याय-तुष्ट‍ि के बारे में आपका क्या मत है? इसका जबाव क्यों नहीं मिलता। साभार Sushobhit Singh Saktawat
6. अंधभक्ति को कोसा जाता है तो अंधविरोध को समर्थन क्यों दिया जाता है।
7. हिंदू आतंकवाद के नाम का ढिंढोरा पीटने वाले लोग, इस्लामिक आतंकवाद, नक्सल आतंकवाद, केरल में कम्यूनिस्ट आतंकवाद, पश्चिम बंगाल में टीएमसी आंतकवाद के नाम पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं।
8. हिंदू कट्टरता, सवर्ण कट्टरता को​ ढिंढोरा पीटने वाले लोग मुस्लिम या किसी और धर्म की कट्टरता के नाम पर मौन क्यों धारण कर लेते हैं।
मेरे बुद्धिजीवी मित्र इस बात का ध्यान रखें कि इस प्रश्नों को पूछने का अर्थ यह क​तई न निकालें कि में किसी भी गलत घटना का समर्थन कर रहा हूं। प्रश्न सबसे होने चाहिए, क्योंकि जबावदेही तो सबकी बनती है। यह सूचनाओं का दौर है, जो जानकारी हम तक कभी पहुंचती नहीं थी, वह छन-छनकर बाहर आ रही है। बंद कमरों में होने वाले सेमिनार और सभायें अब सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर होने लगी हैं। तो प्रश्न तो होंगे। अगर यहां कुछ गलत पूछा गया हो, तो उसे ठीककर मेरा ज्ञानवर्धन भी करें। -------आदित्य शुक्ला