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जनवरी 06, 2020

छात्रों के सहारे राजनीति तलाशती पर्टियां


जेएनयू में कल जो हुआ वह निंदनीय है। नकाबपोश गुन्डों ने एबीवीपी और वामपंथी विचारधारा के समर्थक विद्यार्थियों को पीट—पीटकर घायल कर दिया। उसके बाद शुरू हुयी पार्टियों की राजनीति और मीडिया का खेल। आजकल मीडिया खेल खेलने लगा है। दोनों ओर के मीडिया चैनलों एक दूसरे को विक्टिम की तरह पेश करना शुरू किया। लेकिन सबसे उम्दा मीडिया सोशल मीडिया ने उनका खेल बिगाड़ दिया जो मीडिया चैनल एबीवीपी और लेफ्ट के लिए बैटिंग कर रहे हैं अंत में उन्हें खबरों मं नकाबपोश लिखना पड़ा। ये नकाबपोश कौन थे अभी तक किसी को नहीं पता। दोनों ओर में व्हाटस ऐप में स्क्रीनशॉट वायरल हो चुके हैं। इनकी पड़ताल जारी है, और धीरे—धीरे एक और क्रांति का पटाक्षेप होता दिख रहा है। ऐसे में जो राजनीतिक पार्टिंयां छात्रों के सहारे जमीन तलाशने में लगी थीं वो एक बार ओर मुंह की खाती दिख रही हैं।
जेएनयू का आंदोलन फीस और हॉस्टल नियमों में बदलाव के खिलाफ पिछले तीन महीने से चल रहा है, पहले कक्षाएं नहीं चलने दी गईं। फिर परीक्षाओं का बहीष्कार किया और अब नामांकन प्रक्रिया को बाधित करने का दौर जारी था। फिर भी कई विद्यार्थियों ने नए सत्र के लिए नामांकन किया। तीन जनवरी को नामांकन प्रक्रिया को बाधित करने के लिए सर्वर रूम को बंद करने वाले छात्रों में भी नकाबपोश शामिल थे। इनका वीडियो भी सोशल मीडिया पर तैर रहा है। इसमें कौन लोग हैं, वो आसानी से पहचाने जा सकते हैं। इससे नाराज होकर आंदोलन कर रहे और नामांकन करने वाले छात्रों के बीच मारपीट हुई। इसी बीच घटना में नकाबपोशों के आगमन होता है और फिर शुरू होती है राजनीति।
इस जड़ तलाशने की कोशिश करते हैं। ये कोई नया नहीं है अभी हाल ही में नागरिकता संसोधन विधेयक के समय भी जामिया और एएमयू के छात्रों को मोहरे की तरह उपयोग किया गया। जाधवपुर की खबरों से भी आप लोग वाकिफ होंगे। वहां राज्यपाल तक को घुसने नहीं दिया जाता। पूरे देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों के बीच छुटपुट झडपें आम बात है। लेकिन जेएनयू है, दिल्ली में है, मीडिया पास है तो पक्ष क्या विपक्ष और विपक्ष क्या दोनों अपने अपने लोगों के साथ आसानी से खड़े हो जाते हैं और मीडिया को मुद्दा मिल जाता है, अपनी टीआरपी को रंगने का। असल में मेरी समझ यह कहती है कि अधिकतर विपक्षी पर्टियों की जमीन खिसक रही है। नागरिकता संसोधन विधेयक पर प्रारंभ में तो सहयोग मिला, वह भी अब ढलान की ओर है। ऐसे में राजनीति के सबसे आसान मोहरे, विद्यार्थियों को भड़काओ, उनके आंदोलनों में खुद की राजनीति घुसाओ और आग लगी रहने दो। जब तक दिल्ली चुनाव नहीं हो जाता।
ऐसे मौकों पर केन्द्र, राज्य सरकार और पुलिस की भूमिका अहम हो जाती है। तीनों को चाहिए की राजनीति छोड़कर इस घटना की निष्पक्ष जांच करायें और जो भी लोग इस विभत्सकृत्य में शामिल हैं, चाहें वो किसी गुट के हों, उन्हें मीडिया के सामने लाकर, पूरे देश को बतायें कि ये लोग यहां पढ़ने नहीं आते गुंडागर्दी करने आते हैं। लेकिन इसकी उम्मीद भी कम ही दिखती है, जेएनयू में लगे नारों की जांच की फाइल दिल्ली की आप सरकार अब भी दबा के बैठी है जबकि कोर्ट कई बार इस मामले में टिप्पणी कर चुका है। इस नउम्मीदी के दौर में हम केवल ये कर सकते हैं, इसमें शामिल लोगों को जैसे हो सके बेनकाब करें। वैसे वो हो भी रहे हैं और होते भी रहेंगे।

सितंबर 09, 2017

से​लेक्टिव नैरेटिव का अंतकाल....

हाल के दिनों में सेलेक्टिव नैरेटिव की बानगी कई बार देखने को मिली। चाहें वह नॉट इन माइ नेम आंदोलन हो या हाल ही में जो गौरी लंकेश की हत्या को लेकर चल रहा विमर्श हो। इन सभी में एक समानता थी, वह थी 'हिंदूत्व विरोध'। मोदी विरोध और संघ विरोध तो इ​सलिए क्योंकि ये हिंदुत्व के पोषक माने जाते हैं और भाजपा विरोध इसीलिए कि वह इसी विचारधारा के लोगों की पार्टी है। इनके विरोध के पैमाने देखिए ये हिंदुत्व को हमेशा ही ब्राह्मणवाद और कट्टरवाद से जोड़ देंगे। विरोध में शामिल विरोधियों से अगर ये सवाल करो को कि क्या दूसरे अन्य संप्रदायों में क्या कट्टरता, रूढ़िवाद नहीं है? तब ये कहेंगे कि आप धर्म की राजनीति करते हो, चाहे धर्म का सही अर्थ क्या है, उन्हें मालूम हो या न मालूम हो। और आप को एंटी सेकुलर घोषित करते उन्हें ज़रा भी देर नहीं लगेगी। ज्यादा बहस में उलझेंगे तो ​कट्टर हिंदू, हिंदू आतंकवादी, हिंदुत्व ​ब्रिगेड न जाने किस—किस नाम से संबोधित करने लगेंगे। फिर आपको संघी और मोदी भक्त तक ले जायेंगे। गौरतलब है कि इनका विमर्श किसी एक मुद्दे पर टिककर नहीं हो सकता।
अगर आप इनसे कहेंगे कि एक मुद्दे पर टिके रहो वो इनसे नहीं हो पाता, ये आपको घुमा फिराकर सेकुरलिज्म, हिंदुत्व, मोदी भक्ति, भगवा भक्ति में घेरने की कोशिश करेंगे, अगर नहीं हो पाया तो कट्टरपंथी होने का मेडल देकर भाग लेंगे। संघ का विरोध करेंगे तो 1920—1950 तक लेकर जायेंगे और कहेंगे कि सारे संंघ समस्त हिंदुवादी संगठनों का संचालक है। फिर सावरकर, गोडसे की से आपकी रिश्तेदारी घोषित कर देंगे। लेकिन अगर इनमें पूछो कि नक्सलवाद और हिंदुत्व घृणावाद से जुड़े हुए संगठन भी तो आपकी विचारधारा की उपज हैं तो ये कहेंगे नहीं उनसे हमारा कोई लेना देना नहीं और ज्यादा विमर्श में उलझे तो आप संविधान विरोधी हैं और भगवा आतंकी हैं। मोदी को विरोध करना तो इनका जन्मसिद्ध अधिकार है। जिसे ये फासिज्म, हिटलर न जाने क्या—क्या नामों से जोड़ते रहते हैं। परंतु अंधविरोध करते—करते ये भूल जाते हैं कि इस सेलेक्टिव नैरेविटिज्म का नुकसान किसे और फायदा किसे हो रहा है?
सोशल मीडिया के आने से सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं को हुआ है। बंद कमरों और सेमिनार हाल में जो विमर्श अब सोशल मीडिया पर हो रहा है और यहां दूध का दूध और पानी का पानी होते देर नहीं लगती। सोशल मीडिया ने कलेक्टिव काउंटर नैरेटिव का जन्म दिया है। जहां ये सेलेक्टिव नैरेटिव करने वाले लोग टिक नहीं पाते। पहले टीवी, न्यूजपेपर जिसको छापने से कतराते थे आज सोशल मीडिया पर चला रहा विमर्श दिखाना और लिखना इनकी मजबूरी बन गया। मेरे बुद्धिजीवी मित्र इस बात का ध्यान रखें कि यह सब लिखने का आशय यह क​तई नहीं है कि में किसी भी गलत घटना का समर्थन कर रहा हूं। जनता की बात करनी है तो सबकी बात करनी पड़ेगी। दोहरा चरित्र नहीं चल पायेगा। हत्या विरोध करना है तो सभी हत्याओं को समान रूप से देखना
होगा। कट्टरपंथ का विरोध करना है तो हर धर्म और संम्प्रदाय में व्याप्त कट्टरपंथ का विरोध करना होगा। सामाजिक न्याय की बात करनी है हर धर्म और संम्प्रदाय के लोगों के हक
की लड़ाई लड़नी होगी। अरे ऐसा कहीं पढ़ा था तुम्हारा मूलमंत्र तो हक की लड़ाई लड़ना था,
हर दबे—कुचले वर्ग की। या ये केवल ढकोसला था। या फिर सत्ता की लोलुपता ने तुम्हें अंधविरोधी बना दिया और वह अंधविरोध अब सेलेक्टिव अंधविरोध में बदल चुका है। —————————आदित्य शुक्ला