सितंबर 18, 2016

बेदाग छवि के बावजूद
अपनी बेदाग छवि के लिए अखिलेश यादव की सक्रियता दिख रही है। पर परिवार के झगड़े जिस तरह से सामने आ रहे हैं, उसे देखते हुए प्रदेश चुनाव में सपा कितना बेहतर प्रदर्शन कर पायेगी! यूपी में चल रही सियासी खींचतान और अन्य प्रमुख पर्टियों की चुनाव से पहले की स्थिति का आंकलन करता आलेख अमर उजाला काम्पेक्ट में प्रकाशित हुआ।
 http://compepaper.amarujala.com/kc/cp/20160916/06.html?format=imga

सितंबर 14, 2016

रेडियो के रथ पर सवार



वाणी वो बाण है, जिसे चतुराई से इस्तेमाल किया जाए तो, यह बिना घाव किए, बड़े से बड़े युद्ध फतह करवा देती है। यही काम अब हमारी आकाशवाणी को करना है। 

मार्च 04, 2016

कन्हैया तुम भगवान नहीं हो!

जेल से आने के बाद जिस तरह से कन्‍हैया ने देश के जमीन से जुड़े मुद्दों की बातें की वह कबिले तरीफ है। समाजशास्‍त्र की पढ़ाई और अफ्रीकी देशों पर में चल रहे अपने शोध से उन्‍होंने शायद यही सोच पाया कि देश को सामंतवाद और पूंजीवाद से आजादी चाहिए। जिसे लोग दक्षिणपंथ भी कहते हैं। मुझे बहुत ज्‍यादा समझ नहीं है, पर जितना जानता हूं उस लिहाज से कह रहा हूं, कि वामपंथ की विचारधारा एक ऐसी विचारधारा है जहां लौटने की बात शायद भविष्‍य में की जाये। जिसकी एक बानगी हमें समग्र विकास जैसे जुमलों में नज़र आती है। परंतु हर कोई इसके विकृत रूप से डरता है, जहां बंदूक की गोली ही सत्‍ता प्राप्‍त करने का माध्‍यम बन जाती है। दक्षिणपंथ उन लोगों को समझ आता है, जो आलस्‍य और प्रमाद में जीवन जीना चाहते हैं। जहां एक और संघर्ष की बात होती, वहीं दूसरी और तथाकथित विकास और विलासता की बात होती है। जहां एक ओर गरीबी और अमीरी की खायीं पाटने की बात की जाती है, वहीं दूसरी और यह खायीं बढ़ती रहे, सरकारों को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। शायद इसी लिए वामपंथी लोग आतंकवाद और नक्‍सलवाद जैसी समस्‍या को उस संघर्ष की पैदाइश मानते हैं, जो दक्षिणपंथ के विचारधारा के नीचे दबाये और कुचले गए हों। यह विचारधाराओं का द्वंद है, जो निरंतर चलता आ रहा है आज से नहीं अनादिकाल से। उसमें उसी विचारधारा की जीत होती है जिसे समाज की अधिकतर वर्ग मान्‍यता देता है। ये वैचारिक गुलामी की परंपरा है। दोनों विचारधारायें आम आदमी को अपना गुलाम बनाना चाहती हैं। चाहें वह दक्षिणपंथ हो या वामपंथ। आज अगर दक्षिणपंथ से आजादी के नारे लग रहे हैं तो वामपंथ से आजादी के नारे भी खूब लगते हैं। भारत में भी इस वैचारिक गुलामी की परंपरा रही है, आजादी के बाद के दौर का विश्‍लेषण करें तो पायेंगे। वामपंथ से तटस्‍थ होते-होते हम दक्षिणपंथी होते चले गए। हर जगह वामपंथ हारता गया। संयुक्‍त सोवियत संघ ने भी विघटन के बाद दक्षिणपंथी विचारों का गुलाम होना उचित समझा। तृतीय विश्‍व‍ भी इसी दक्षिणपंथ की बाट जोहता नज़र आता है। भारत को भी इसी दक्षिणपंथ का सहारा मिला, देश को विश्‍व‍ के अन्‍य देशों के समकक्ष लाने के लिए। भारत में आज भी हमें मूलभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति की बात करनी पड़ती है। जब आवश्‍यकता बलबती होती है, तो दक्षिणपंथ ही सहारा नजर आता है। ऐसे भारत में अभी इस विचारधारा से मुक्ति की बात कहना बेमानी सा लगता है।

कन्‍हैया के भाषण में जेएनयू के हजारों छात्र उपस्थित थे। एक बात दावे से कह सकता हूं, कि उनमें भी 90 फीसदी लोग इस दक्षिणपंथी मानसिकता का शिकार होगें। जिन्‍हें ब्रांडेड कपड़े पहने का शौक होगा, जो शायद ही किसी राह चलते गरीबी की मदद को हाथ बढ़ते होंगे। हो सकता है 10 फीसदी तुम्‍हारे साथ हों। फिर ऐसे में सरकार के 31 फीसदी वोटों पर तुम्‍हारा तंज समझ नहीं आता। यह देश जहां कु वोट ही 55-60 फीसदी लोग डालते हों, वह 31 फीसदी वोट बहुत होते हैं। कन्‍हैया एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ की तरह अपनी बात रख रहे थे और नैतिकता की बात कर रहे थे, परंतु उन्‍हें यह याद रखना चाहिए कि राजनीति में नैतिकता नहीं होती, यहां केवल नीति चलती है। उसी नीति का तुम भी शिकार हो रहे हो। तुम्‍हारे सहारे वाम, भारत में वापस आये, यह हो सकता है, लेकिन भारत की जनता आलसी होने में ज्‍यादा मजे लेती है। यहां मजदूरी करने में मज़ा नहीं आता भिखारी बनने में मजा आता है। मुझे लगता है आज जो लोग तुम्‍हारी वाहवाही कर रहे हैं, तुम्‍हारी सोच को सराह रहे हैं, वह लोग कल तुम्‍हारा साथ न छोड़ दें। जैसे पहले भी होता आया है। तुम्‍हारी विचारधारा सराहनीय है, लेकिन राजनीति मे आते ही इस विचारधारा को दक्षिणपंथ की गोद में बैठते मैने कई बार देखा है। तुम्‍हारा भी हश्र वही न हो। रही बात मीडिया की, उसका एक चरित्र है, इसे कोई पात्र चाहिए होता है, आजकल पात्र तुम हो। मीडिया पर तुम्‍हारा मंचन चल रहा है। एक साल पहले पात्र कोई और था। उससे एक साल पहले कोई और। मीडिया, पात्रों के सहारे जीता है। यह पात्र बदलते है, मीडिया नहीं, बस पात्रों से जुड़ी कहानियां बदल जाती हैं।

अनायास ही गीता के श्‍लोक याद आ गये। भगवान कृष्‍ण, विषाद में फंसे अर्जुन को उपदेश देते हुए, युद्ध करने के लिए तैयार कर रहे हैं और यह ज्ञान अर्जुन के अलावा संजय के माध्‍यम से धृतराष्‍ट्र भी समझ पा रहे हैं। कुछ ऐसा ही कल भी हुआ। कन्‍हैया कुमार के भाषण के समय भी कुछ ऐसा ही चरित्र रचने की कोशिशें की गई। मानों जेएनयू कुरूक्षेत्र की भूमि हो, कन्‍हैया कुमार खुद कृष्‍ण हो जिन्‍हें भगवान माना जाता है और वह जनता रूपी अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हों। मीडिया संजय की तरह, धृतराष्‍ट्र रूपी जनता तक सबकुछ लाइव दिखा रहा हो। परंतु देशकाल और समय की परिस्थितियां विपरीत हैं। आज का धृतराष्‍ट्र प्रतिक्रिया देना सीख गया है। सोशल मीडिया उसका अच्‍छा हथियार है। सुबह होते-होते कन्‍हैया के ज्ञानरूपी भाषण का खूब विश्‍लेषण होता है और वह #टैग जैसे छोटे से अविष्‍कार के बदौलत विश्‍वभर में सबसे ज्‍यादा खोजे जाने वाला इंसान बन जाता है। परंतु कन्‍हैया को यह नहीं भूलना चाहिए, कि वह भगवान नहीं है! वह उन्‍हीं तथाकथित विचारधाराओं का गुलाम है, जिन्‍होंने विश्‍व‍भर की जनता को लड़ाने के लिए जाना जाता है।

आज बात मानवतावाद की होनी चाहिए। एक ऐसा वाद जहां भाव संवेदना हो, जहां प्रेम हो, जहां करूणा हो, जहां दया हो। ऊंच-नीच, जात-पात और अमीरी-गरीबी का फर्क तब तक नज़र आता है, जब तक भाव संवेदना प्रबल नहीं होती। जरूरत है भाव संवेदना जागने की। मानवीय हृदय में करूणा के जागरण की। सभी समस्‍यायें खुद ब खुद खत्‍म होती चली जायेंगी। 

फ़रवरी 23, 2016

आत्‍महत्‍या की अनसूलझी पहेली


खंड-खंड होता बुंदेलखंड

कहते हैं कि वक्‍त और भूखमरी की मार जब सवाल करती है तो कोई भी जबाब हो नकाफी नज़र आता है। बुंदेलखंड के साथ भी ऐसा ही हो रहा  है। यहां एक बार फिर सूखा पड़ा है। न खाने को रोटी है और न पीने को पानी। ऐसी अवस्‍था में बड़े-बड़े राहत पैकेज बोने पड़ जाते हैं। कुछ रोज पहले खबरों में बुंदेलखंड का खूब बोलबाला रहा, अब गायब है। क्‍योंकि खबर तो खबर है कुछ देर चलती है फिर गिरा दी जाती है, तर्क आता है लगातार दुर्दशा दिखाने से भी निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे में लगातार 3 और 1987 से अबतक 19 सूखे झेल चुका बुंदेलखंड अपनी आप बीती सुनाये भी तो किसे। ऐसे में बुंदेलखंड खंड-खंड होता जा रहा है।
हाल ही में बुंदेलखंड को पास से देखने का मौका मिला। दूर-दूर तक जहां तक नज़र जा सकती है, वहां तक देखो, बंजर पड़ी खेती यहां की कहानी खुद ही बंया करने लगती है। हरियाली का नामोनिशां नहीं है। गांव के गांव खाली हो रहें, लोग पलायन कर रहे हैं। जो यह नहीं कर सकते वह जिंदगी से पलायन का फैसला कर लेते हैं। बुदेलों की यह धरती जो वीरता और गौरव की गाथाओं से भरी पड़ी है, वहां आज दुर्दशा के गीते सुनायी देते हैं। झांसी के खिसनी बुजुर्ग गांव में 3300 एकड़ जमीन है, सूखे के कारण यहां 100 एकड़ में भी अनाज नहीं उपजाया जा सका। किसानों पर बैंको का करोड़ों रूपया बकाया है, आंकड़े बताते हैं कि बुंदेलखंड के लगभग 14 लाख किसानो पर सरकारी बैकों का एक हजार करोड़ से ज्‍यादा रूपया बकाया है। यहां पीने के पानी की उपलब्‍धता न के बराबर है, लोग नालों का पानी पीकर अपनी प्‍यास बुझा रहे हैं। सरकार घोषणायें तो करती है, ले‍किन इस नसूर बन चुके सुखे के जख्म को त्‍वरित की मदद की आवश्‍यकता होती है। ऐसे में सरकारी मशीनरी की लेटलतीफी के चलते यह जख्‍म किसानों को निगलता जा रहा है। आंकड़ों की माने तो यहां बीते 6 सालों 4 हजार से ज्‍यादा किसानों न आत्‍महत्‍या या आत्‍मदाह किया है। यह तो सिर्फ आंकड़ें हैं, कई मौतें तो इसमें रिकार्ड ही नहीं होती। इन मौतों का जिम्‍मेदार किसे मानें, कर्ज, सूखा या भूख को। फिर सबकुछ एक साथ आ जाये तो क्‍या होगा। हाल ही में एक किसान ने उस दिन चौराहे पर आत्‍मदाह कर लिया जब देश के प्रधानमंत्री किसानों से मन की बात कर रहे थे। कारण था फसल का मुआवजा न मिलना। वह बच गया उसका इलाज चल रहा है। लेकिन हैरत तो तब होता है जब सरकारी मशीनरी का कोई भी मुलाजिम उसे देखने तक नहीं पहुंचा। ऐसे में मन की बात केवल और केवल खयाली पुलाव भर नज़र आते हैं।
देश की राजनीतिक दृष्टि से देखें तो बुंदेलखंड खासी अहमियत रखता है। फिर चाहें वह प्रादेशिक राजनीति हो यह देशिक राजनीति। इसीलिए बुंदेलखंड को अलग राज्‍य बनाने की मांग भी उठती रहती है। परंतु इस क्षेत्र के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों को देखा जाये तो वह नकाफी नज़र आते हैं क्‍यों‍कि धरातल पर उतरते-उतरते वह प्रयास भ्रष्टाचार का शिकार हो गए। यदि प्रयासों के सही क्रिन्‍यावयन की व्‍यवस्‍था सरकार ने कर दी होती तो स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। न तो यहां किसी समस्‍या का निष्‍पक्ष आंकलन होता है और न ही सही रिपोर्ट ऊपर तक पहुंचती है। सही सोच और देशज नजरिया सबकुछ बदल सकता है।

कभी जल, जंगल और जमीन के सौंदर्य से भरपूर बुंदेलखंड आज कराह रहा है, इसके लिए सरकार को वृहद योजनायें बनाने की बजाय छोटे-छोटे स्‍तर तक जाकर काम करना होगा। घावों पर संवेदना का मरहम तभी लगाया जा सकता है, जब हम मरीज के पास जायें। बुंदेलखंड को पैकेज के साथ-साथ भाव संवेदना की भी आवश्‍यकता है। यहां संवाद की जरूरत है, संवाद उन किसानों से जो जिंदगी की जंग को हारने की तैयारी कर रहा है। बुंदेलखंड को संजीवनी की आवश्‍यकता है, इसके लिए अलग राज्‍य बनाने की आवश्‍यकता नहीं है। समझदारी, ईमानदारी और जिम्‍मेदारी से यदि कार्य किया जाये तो बन सकती है। आल्‍हा, उदल, बुंदेलों, चंदेलों और झांसी की रानी के इस इलाके जनमानस को भी एकजुट होकर प्रयास करना होगा खुद की दशा सुधारने के लिए। खुद का किया गया पुरूषार्थ ही आखिर में काम आता है।
कहते हैं कि वक्‍त और भूखमरी की मार जब सवाल करती है तो कोई भी जबाब हो नकाफी नज़र आता है। बुंदेलखंड के साथ भी ऐसा ही हो रहा  है। यहां एक बार फिर सूखा पड़ा है। न खाने को रोटी है और न पीने को पानी। ऐसी अवस्‍था में बड़े-बड़े राहत पैकेज बोने पड़ जाते हैं। कुछ रोज पहले खबरों में बुंदेलखंड का खूब बोलबाला रहा, अब गायब है। क्‍योंकि खबर तो खबर है कुछ देर चलती है फिर गिरा दी जाती है, तर्क आता है लगातार दुर्दशा दिखाने से भी निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे में लगातार 3 और 1987 से अबतक 19 सूखे झेल चुका बुंदेलखंड अपनी आप बीती सुनाये भी तो किसे। ऐसे में बुंदेलखंड खंड-खंड होता जा रहा है।
हाल ही में बुंदेलखंड को पास से देखने का मौका मिला। दूर-दूर तक जहां तक नज़र जा सकती है, वहां तक देखो, बंजर पड़ी खेती यहां की कहानी खुद ही बंया करने लगती है। हरियाली का नामोनिशां नहीं है। गांव के गांव खाली हो रहें, लोग पलायन कर रहे हैं। जो यह नहीं कर सकते वह जिंदगी से पलायन का फैसला कर लेते हैं। बुदेलों की यह धरती जो वीरता और गौरव की गाथाओं से भरी पड़ी है, वहां आज दुर्दशा के गीते सुनायी देते हैं। झांसी के खिसनी बुजुर्ग गांव में 3300 एकड़ जमीन है, सूखे के कारण यहां 100 एकड़ में भी अनाज नहीं उपजाया जा सका। किसानों पर बैंको का करोड़ों रूपया बकाया है, आंकड़े बताते हैं कि बुंदेलखंड के लगभग 14 लाख किसानो पर सरकारी बैकों का एक हजार करोड़ से ज्‍यादा रूपया बकाया है। यहां पीने के पानी की उपलब्‍धता न के बराबर है, लोग नालों का पानी पीकर अपनी प्‍यास बुझा रहे हैं। सरकार घोषणायें तो करती है, ले‍किन इस नसूर बन चुके सुखे के जख्म को त्‍वरित की मदद की आवश्‍यकता होती है। ऐसे में सरकारी मशीनरी की लेटलतीफी के चलते यह जख्‍म किसानों को निगलता जा रहा है। आंकड़ों की माने तो यहां बीते 6 सालों 4 हजार से ज्‍यादा किसानों न आत्‍महत्‍या या आत्‍मदाह किया है। यह तो सिर्फ आंकड़ें हैं, कई मौतें तो इसमें रिकार्ड ही नहीं होती। इन मौतों का जिम्‍मेदार किसे मानें, कर्ज, सूखा या भूख को। फिर सबकुछ एक साथ आ जाये तो क्‍या होगा। हाल ही में एक किसान ने उस दिन चौराहे पर आत्‍मदाह कर लिया जब देश के प्रधानमंत्री किसानों से मन की बात कर रहे थे। कारण था फसल का मुआवजा न मिलना। वह बच गया उसका इलाज चल रहा है। लेकिन हैरत तो तब होता है जब सरकारी मशीनरी का कोई भी मुलाजिम उसे देखने तक नहीं पहुंचा। ऐसे में मन की बात केवल और केवल खयाली पुलाव भर नज़र आते हैं।
देश की राजनीतिक दृष्टि से देखें तो बुंदेलखंड खासी अहमियत रखता है। फिर चाहें वह प्रादेशिक राजनीति हो यह देशिक राजनीति। इसीलिए बुंदेलखंड को अलग राज्‍य बनाने की मांग भी उठती रहती है। परंतु इस क्षेत्र के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों को देखा जाये तो वह नकाफी नज़र आते हैं क्‍यों‍कि धरातल पर उतरते-उतरते वह प्रयास भ्रष्टाचार का शिकार हो गए। यदि प्रयासों के सही क्रिन्‍यावयन की व्‍यवस्‍था सरकार ने कर दी होती तो स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। न तो यहां किसी समस्‍या का निष्‍पक्ष आंकलन होता है और न ही सही रिपोर्ट ऊपर तक पहुंचती है। सही सोच और देशज नजरिया सबकुछ बदल सकता है।
कभी जल, जंगल और जमीन के सौंदर्य से भरपूर बुंदेलखंड आज कराह रहा है, इसके लिए सरकार को वृहद योजनायें बनाने की बजाय छोटे-छोटे स्‍तर तक जाकर काम करना होगा। घावों पर संवेदना का मरहम तभी लगाया जा सकता है, जब हम मरीज के पास जायें। बुंदेलखंड को पैकेज के साथ-साथ भाव संवेदना की भी आवश्‍यकता है। यहां संवाद की जरूरत है, संवाद उन किसानों से जो जिंदगी की जंग को हारने की तैयारी कर रहा है। बुंदेलखंड को संजीवनी की आवश्‍यकता है, इसके लिए अलग राज्‍य बनाने की आवश्‍यकता नहीं है। समझदारी, ईमानदारी और जिम्‍मेदारी से यदि कार्य किया जाये तो बन सकती है। आल्‍हा, उदल, बुंदेलों, चंदेलों और झांसी की रानी के इस इलाके जनमानस को भी एकजुट होकर प्रयास करना होगा खुद की दशा सुधारने के लिए। खुद का किया गया पुरूषार्थ ही आखिर में काम आता है।
Article published in Madhya Pradesh Jan Sandesh Paper 19/01/2016.

फ़रवरी 21, 2016

मीडिया और राजनीति का रंगमंच

पिछले दस दिनों से बहुत ही भयावह स्थिति से गुजर रहा हूं। ठीक से नींद नहीं आ रही। डरा सा हूं। सहमा सा हूं। ऐसा डर ऐसी स्थिति मैने अपने इस अल्‍प जीवनकाल में कभी नहीं देखी। हिंदूत्‍व की विचारधारा में पला-बढ़ा, विद्यामंदिर से शिक्षा ग्रहण की जहां देशभक्ति का पाठ खूब पढ़ाया जाता है। 15 अगस्‍त और 26 जनवरी या कहीं भी जब भी तिरंगा फहरते देखता हूं तो रोम-रोम पुलकित हो जाता है। 2 अक्‍टूबर को लालबहादूर शास्‍त्री के जीवन संस्‍मरण सुनकर अपने आसूं रोक नहीं पाता वहीं कलाम जी के जाने पर खूब रोता हूं। भगत को पढ़ता हूं तो कामना करता हूं कि बेटा हो तो भगत जैसा। भारत माता पर बलिदान हुए सपूतों की कहांनियां आंखों में आंसू ला देती हैं। जमीन से जुड़ा हर मुद्दा सिसकने पर मजबूर कर देता है।  
मैं किसी विचारधारा विशेष का समर्थक नहीं हूं। मीडिया पढ़ता हूं इसलिए पढ़ना पड़ता है, सबको पढ़ता हूं, हर विचारधारा को चाहें वह किसी भी तथा‍कथित वाद से प्रेरित हो। हर विचारधारा में अपनी अच्‍छाई हैं, अपनी बुराईयां। परंतु जिस तरह का माहौल पिछले दिनों बनाया गया, उसे देखकर, सुनकर ऐसा नहीं लगा कि मेरे यह कोई भी तर्क मेरे देशभक्‍त होने का प्रमाण है। जेएनयू प्रकरण पर जो हुआ उस पर खूब बहस हुई, देश के खिलाफ नारे किसी भी सच्‍चे भारतवासी को बर्दाश्‍त नहीं हो सकते। लेकिन जब से देख रहा हूं सब कुछ पहले से रचा रचाया लग रहा है। मीडिया और राजनीति का रंगमंच सजा है, जिसकी कहानी पहले ही लिखी जा चुकी है।
कब नारे लगने हैं। कब वीडियो दिखाना है। कब देशद्रोही का तमागा दिया जायेगा। देश में खलबली मचेगी। कब पुलिस किसी को गिरफ्तार करेगी। कब कौन सी पार्टी का नेता जेएनयू पहुंचेगा। कब पटियाला हाऊस कोर्ट में बवाल होगा। कब एबीवीपी के 3 कार्यकर्ता इस्‍तीफा देंगे। कब देश के सर्वोच्‍च चिन्‍ह तिरंगे का राजनीतिकरण किया जायेगा। कब वीडियो के फर्जी होने की बात सामने आयेगी। कब केरल में आरएसएस के कार्यकर्ता की हत्‍या होगी। कब जादवपुर भी जेएनयू के साथ खड़ा हो जायेगा। कब पटियाला हाउस कोर्ट में वकील ही जज की भूमिका में आ जायेंगे। कब मेक इन इंडिया के पंडाल में आग लगेगी। कब किसी को गालियों और गोलियों के लिए कहा जायेगा। कब कौन सा प्रवक्‍ता टीवी पर क्‍या बोलेगा। कब जेएनयू बचाओ रैली निकाली जायेगी। कब यूनिटी मार्च होगा। कब सोनी सोरी पर हमला होगा। सबकुछ पहले से निर्धारित सा लग रहा है। कब टीवी अंधा हो जायेगा। सबकुछ ऐसे हो रहा है मानों दोनों ओर से पहले ही कहानी लिखी जा चुकी है, मंचन चल रहा है, किरदार वही पुराने हैं ले‍किन उनके दायित्‍व बदल चुके हैं। सूचना के सर्वोच्‍च साधन टीवी से सूचना गायब है। लोकतंत्र का चौथे खंभा, बाकी बचे तीनों खंभों की जिम्‍मेदारी संभाल रहा है। लोकतंत्र अपंग हो चुका है। भीड़ और मीडिया देश की दिशाधारा तय करने लगी है। प्रवक्‍ताओं के कहने ही क्‍या देश को राज्‍यवाद और राष्‍ट्रवाद में उलझा रहे हैं। इसी बीच ये भी पता चलता है कि किसान फैशन में आत्‍महत्‍या करते हैं। कई मुद्दे हैं, कई सवाल हैं, पर जबाव नदारद है। दोनों ओर के लोग एक दूसरे को सबक सिखाने पर आमादा हैं। सोशल मीडिया इसमें महत्‍ती भूमिका अदा कर रहा है। जैसे रंगमंच में लाइटिंग की होती है। कब किस पात्र पर फोकस करना है, यह सोशल मीडिया पर तय हो रहा है। देश के 15 फीसदी से भी कम टेक्‍नोसेवियों का अड्डा सोशल मीडिया, देश की 100 फीसदी जनता का फोकस तय कर रहा है। खुले पत्र लिखने की होड़ मची है, कोई प्रधानमंत्री को लिख रहा है, तो कोई पत्रकारों को।

हम भारतीय भी इस रंगमंच में किरदार बनते जा रहे हैं। पहले दर्शक बने, फिर भावना उमड़ी और हम भी किरदार की भूमिका में हैं। रंगमंच में भी यही होता है। मीडिया, सत्‍ता के गठजोड़ में आम आदमी जाये भी तो कहां जाये। 1 अरब 25 करोड़ आबादी वाले देश में, 1 करोड़ से भी कम लोग देश के हर नागरिक के प्रवक्‍ता बन बैठें हैं। ये कैसा दौर है, ये कैसा समय हैं। जहां देश के सबसे सम्‍पन्‍न राज्‍यों में गिना जाने वाला हरियाणा, आरक्षण की आग झेल रहा है। इसके असर अन्‍य राज्‍यों में दिख रहे हैं। देश किस दिशा में जा रहा है। उत्‍तर कौन देगा। क्‍या ऐसे ही भारत विश्‍व गुरू बनेगा। अगर यही स्थिति रही है तो देश में आग लग जायेगी, जब देश जलेगा तो लाशों का न तो कोई धर्म होगा, न कोई वाद। ऐसी स्थिति में देश को जाने से बचा लो। 

दिसंबर 12, 2014

धर्मांतरण पर छिड़ी बहस

 
सवाल यह भी है कि धर्म किसी व्यक्ति के सामाजिक और आर्थिक जीवन में कितना महत्वपूर्ण है। क्या धर्म परिवर्तन से किसी की आर्थिक हालत बदल सकती है?
इन दिनों धर्मांतरण को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा गर्म है। संसद में विपक्षी दलों की मांग पर सरकार को इस पर चर्चा कराने के लिए बाध्य होना पड़ा। गौरतलब है कि बीते दिनों आगरा में कुछ लोगों का धर्मपरिवर्तन कराया गया। धर्मांतरण कार्यक्रम के आयोजकों ने जहां इसे उनकी ′घर वापसी′ बताया, वहीं धर्म परिवर्तन करने वाले कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें धर्म बदलने के लिए विभिन्न तरह के प्रलोभन दिए गए। इस मामले में स्थानीय पुलिस ने कुछ लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला भी दर्ज किया है। कहा जा रहा है कि आगरा में राशन कार्ड बनवाने के बहाने छलपूर्वक धर्म परिवर्तन करवाया गया।
असल में आज धर्म शब्‍द का सर्वाधिक दुरुपयोग किया जा रहा है। धर्म के कथित ठेकेदार गरीबों का धर्म के नाम पर इस्तेमाल कर अपनी रोटियां सेंकते हैं, जिसके चलते सांप्रदायिक तनाव, दंगे होते रहते हैं। सांप्रदायिक तनाव के दौरान जहां कुछ लोगों की जान चली जाती है, वहीं सामाजिक ताने-बाने को भी गहरा नुकसान होता है। धर्म के नाम पर फैली अशांति सामाजिक सद्भाव और सौहार्द के लिए सबसे अधिक खतरनाक है। ऐसे में गंगा-जमनी तहजीब की बात करना बेमानी-सा प्रतीत होता है। धर्म के नाम पर मानवीयता से खिलवाड़ बदस्‍तूर जारी है। लोग सड़कों पर उतरते हैं, दंगे होते हैं, कुछ मौतों पर बहस होती है, और फिर कुछ पल की शांति छा जाती है।
खबरें हैं कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में घर वापसी के नाम पर धर्मांतरण के और भी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। धर्मांतरण के मामले पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों में होते रहे हैं। केरल में 2006 से 2012 के बीच सात हजार से ज्यादा लोगों का धर्म परिवर्तन किया गया था। परंतु किसी ने यह जनाने की कोशिश नहीं की कि अब कैसे जी रहे हैं वे लोग? क्या धर्म परिवर्तन से उनकी सामाजिक और आर्थिक हालत में सुधार हुआ? किसी को बेहतर जिंदगी का लालच देकर धर्म परिवर्तन करना जायज नहीं ठहराया जा सकता। अगर कोई अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करे, तो यह उसकी निजी स्वतंत्रता है।
यहां सवाल यह उठता है कि कोई समाज यदि किसी का धर्म परिवर्तन कर या करा रहा है, तो क्‍या उस समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था है कि वह बाहर से आए मेहमान को स्‍वीकार कर सके और सभी उसके सामाजिक जीवन में सहभागी बन सकंे। क्‍या धर्म परिवर्तन के बाद ऐसा समाज बनाया जा रहा है, जहां किसी के साथ कोई भेदभाव न हो। यदि धर्म-परिवर्तन करने वालों के लिए अपनाए गए धर्म में कोई स्थान नहीं होगा, तो उसे एक तरह से छल और धोखा ही कहा जा सकता है।
सवाल यह भी है कि धर्म किसी व्यक्ति के सामाजिक और आर्थिक जीवन में कितना महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज में जाति की प्रधानता है। जिस देश में एक जाति दूसरी जाति की लड़की या लड़के को विवाह के लिए स्वीकार नहीं कर पाती है, वहां धर्मांतरण करके आए व्यक्ति का समाज में कैसा स्वागत होगा? हमारे देश में हर जाति और धर्म की एक सीमा है, जिससे बाहर निकलकर ही किसी को अपनाया जा सकता है। ऐसे में क्‍या ऐसी व्‍यवस्‍था बन सकती है कि जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया है, वे एक ऐसी नई जाति का गठन कर सकें, जो स्वयं अपने सामाजिक जीवन के भागीदार हों। ऐसी संभावना न के बराबर ही दिखती है।
मसलन, आगरा में धर्म परिवर्तन करने वाले परिवारों के सामने फिलहाल असमंजस की स्थिति है। अब उन्हें न तो हिंदू माना जा रहा है और न ही मुस्लिम। ये लोग अब निराशा और डर में डूबे हुए हैं। इनमें से कुछ आसमान की ओर हाथ उठाकर अपने किए के लिए माफी मांग रहे हैं। हमारे देश के महान संतों ने धर्म के बारे में कहा है कि सभी धर्मों का उद्देश्‍य एक हैा। आज हमारे देश में एक ऐसे धर्म की जरूरत है, जो इंसान को इंसान बनना सिखाए। इंसान में इंसानियत की बड़ी कमी महसूस हो रही है। आगरा वाले मामले ने यह साबित कर दिया है कि हमारी व्यवस्था लोगों को बुनियादी सुविधाएं देने में विफल रही है, जिसका फायदा कुछ असामाजिक तत्व उठा रहे हैं और वे विभिन्न तरह का प्रलोभन देकर लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसा रहे हैं। इस तरह के मामलों से समाज में तनाव पैदा होता है। सरकार को विभिन्न दलों के नेताओं से विचार-विमर्श कर धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए कानून बनाना चाहिए।
आदित्य कुमार शुक्ला
स्वतंत्र टिप्पणीकार

अप्रैल 03, 2014

बिगड़ रहा है भाजपा का सियासी समीकरण!

एक तरफ चुनावी सर्वे एनडीए को बहुमत से कम सीटें बता रहे हैं, दूसरी ओर भाजपा के आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।
आगामी सात अप्रैल को पहले चरण का मतदान शुरू होते ही लोकसभा चुनाव का आगाज हो जाएगा। नौ चरणों में होने वाले इस चुनाव पर संपूर्ण देश की नजरे टिकी हैं। परंतु वर्तमान भारतीय राजनीति के सभी समीकरण उलझे हुए से प्रतीत हो रहे हैं। सत्‍ताधारी पार्टी कांग्रेस ऐसी रणनीति पर चल रही है, जैसे वह पिछले एक दशक से विपक्ष में रही हो। वाम मोर्चा बिखरा-बिखरा नजर आ रहा है। दिल्‍ली में 49 दिनों की सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी राजनीति में खास होती नजर आ रही है।
इसके इतर अनेक राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। भाजपा के लिए सत्ता के दरवाजे खुल गए हैं। माना जा रहा है कि संपूर्ण देश में मोदी की लहर चल रही है। मोदी भी अपनी रैलियों में मंच से बार-बार यही घोषणा करते हैं कि जनता ने दिल्‍ली की गद्दी उन्‍हें सौंपने का मन बना लिया है। लेकिन हाल के चुनावी सर्वे कुछ अलग की कहानी बयां कर रहे हैं। हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक भाजपा का 272 के आंकड़े को पार करने का सपना पूरा नहीं होने जा रहा है।
ताजा सर्वे में यूपीए को 119 से139, एनडीए को 225 से 235 एवं अन्य को 185 से 232 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। वोट शेयर के मामले में यूपीए को 26 फीसदी, एनडीए को 34 फीसदी एवं अन्य को 40 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है। अब इस आंकड़े को देखें, तो लगता है कि इस बार का चुनाव यूपीए बनाम एनडीए न होकर अन्‍य बनाम एनडीए हो रहा है। ऐसे में 66 फीसदी वोट एनडीए के खिलाफ जाता हुआ दिखाई दे रहा है। अगर भाजपा विरोधी ताकतें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एकजुट हो जाती हैं, तो 2014 में इनके पास पूर्ण बहुमत होगा। इसका मतलब यह हुआ कि यूपीए फिर चुपके-चुपके सरकार बनाने की ओर बढ़ रहा है। प्रकाश करात का यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को समर्थन देने के लिए पत्र लिखना भविष्‍य में यूपीए एवं वाम दलों के गठबंधन के संकेत दे रहा है। ज्यादातर सर्वे बता रहे हैं कि एनडीए गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलना मुश्किल है। ऐसे में नरेंद्र मोदी या भाजपा के किसी नेता के प्रधानमंत्री बनाने के आसार कम होते दिख रहे हैं। सभी पूर्वानुमान यही बता रहे हैं कि कि कांग्रेस की भूमिका अहम होने वाली है। शायद इसीलिए कांग्रेस आक्रामकता को त्‍यागकर एक निर्णायक की तरह लोकसभा चुनाव के राजनीतिक रियालिटी शो का आनंद ले रही है। इससे यही निष्‍कर्ष निकलता है कि एनडीए में मोदी का कद जितना बढ़ा है, उतना ही फायदा कांग्रेस को हुआ है, जो खुद को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष बताती है।
एक तरफ चुनावी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, दूसरी तरफ भाजपा के आंतरिक मतभेद भी खुलकर सामने आ रहे हैं। मुख्‍तार अब्‍बास नकबी की ट्वीट, जसवंत सिंह का निर्दलीय चुनाव लड़ना, कानपुर में मुरली मनोहर जोशी का विरोध, मथुरा में हेमामालिनी का विरोध, नवजोत सिंह सिद्धु का अरुण जेटली के चुनाव प्रचार में शामिल होने से इन्कार करना, सब मिलकर मोदी की उलझन को बढ़ा रहे हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को केवल 20 से 25 सीटें ही मिल रही हैं। अगर एनडीए को केंद्र में अपनी सरकार बनानी है, तो उनके पास एक ही विकल्प है कि वह अभी से मायावती, जयलालिता, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू एवं बीजद के साथ गठबंधन के लिए प्रयास शुरू कर दे, क्योंकि इन सबके सहयोग से ही एनडीए 272+ के जादुई आंकड़े को छू सकेगा। लेकिन मुश्किल यह है कि इनमें से अधिकांश दल नरेंद्र मोदी की छवि से चिढ़ते हैं। इसके अलावा उनका मानना है कि मोदी अगर प्रधानमंत्री बने, तो अमीरी-गरीबी की खाई को और अधिक गहरा कर देंगे यानी उनके आते ही कॉरपोरेट जगत का बोलबाला हो जाएगा। उन्‍हें नई आर्थिक उदारवादी नीतियों का मसीहा माना जा रहा है। फिलहाल तो भाजपा के घोषणापत्र में देरी भी यही दर्शाती है कि वह खुद में ही उलझी हुई है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में कौन ऐसा नेता होगा, जो सरकार गठन के लिए अन्य दलों को जोड़ पाएगा।

मार्च 24, 2014

क्या गुल खिलाएगा प्रदेश का सियासी समीकरण




उत्तर प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों पर सभी प्रमुख दलों की नजरें लगी हैं, इसलिए सभी हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। 
लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। चुनाव आयुक्त ने नौ चरणों में होने वाले चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है। इस लोकसभा चुनाव में पिछली बार की तुलना में दस करोड़ ज्यादा मतदाता (कुल 81.4 करोड़) भाग लेंगे। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों की घोषणा शुरू कर दी है, जिसे देखकर लगता है कि अधिकांश दलों को दागी और बागी प्रत्याशियों से कोई परहेज नहीं है। प्रत्‍याशियों के चुनाव में जाति, वंश और वोट बैंक को ध्‍यान में रखकर टिकट बांटे जा रहे हैं। अब तक किसी पार्टी ने अपना घोषणापत्र जारी नहीं किया है। वह तब जारी किया जाएगा, जब उस पर चर्चा के लिए वक्त नहीं बचेगा।
इस बार भी सभी दलों की नजर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश पर है, जहां लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीटे हैं। मतदाताओं को रिझाने के लिए राजनीतिक दल तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगे हैं। आजादी के बाद देश को आठ प्रधानमंत्री देने वाले इस राज्‍य का राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अनुमान लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। प्रदेश का सियासी समीकरण क्या गुल खिलाएगा, यह देखने वाली बात होगी।
भाजपा के लिए जहां उत्तर प्रदेश में फतह का मतलब 272 के जादुई आंकड़े को हासिल करना है, वहीं कांग्रेस को सीट बचाने की चिंता है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के लिए तो यह अस्तित्व की लड़ाई ही है।
उत्तर प्रदेश में 18.5 फीसदी मुस्लिम, 9 फीसदी यादव, 27.5 फीसदी अन्‍य पिछड़ा वर्ग एवं बनिये, 22 फीसदी दलित, 8 फीसदी ठाकुर,13 फीसदी ब्राह्मण और 2 फीसदी जाट मतदाता हैं। आंकड़ों की मानें, तो मुस्लिम और अन्‍य पिछड़ा वर्ग के मतदाता चुनाव में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले हैं। जहां सपा मुस्लिमों की सबसे हितैषी पार्टी होने का दावा करती है, वहीं बसपा दलितों के साथ खड़ी दिखाई देती है। परंतु मुजफ्फरनगर दंगों के बाद समाजवादी पार्टी को पहले की तरह मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन हासिल नहीं होने वाला है। इसके अलावा, मौजूदा समाजवादी पार्टी की सरकार के कामकाज से भी प्रदेश की जनता खुश नहीं दिखाई देती है। वहीं बसपा केवल दलित बाहुल्‍य इलाकों में ही अच्‍छा प्रदर्शन करती दिखाई दे रही है। इसके अलावा केंद्र में कांग्रेसी भ्रष्‍टाचार का समर्थन करने के कारण जनता सपा और बसपा, दोनों से नाखुश है।
ऐसे में सारा दारोमदार आ टिकता है अन्‍य पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक पर, शायद इसी कारण भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के अति पिछड़ा वर्ग से होने को ज्यादा प्रचारित करता रहा है। भाजपा ने अति पिछड़ा कार्ड खेलकर इस लड़ाई को और धारदार बना दिया है, क्योंकि राज्य की 80 में से 45 सीटों पर अति पिछड़ी जातियों की तादाद लगभग डेढ़ से चार लाख के बीच है। लेकिन जीत के लिए भाजपा को सवर्ण वर्ग का वोट भी हासिल करना होगा, क्योंकि कभी-कभी वोटों का मामूली अंतर भी परिणाम को नाटकीय ढंग से बदल देता है।
इसके अलावा, इस बार बड़ी संख्या में युवा और नए मतदाता वोट डालेंगे, जो किसी भी अनुमान को पलट सकने की क्षमता रखते हैं। यूपीए-दो की सरकार के कामकाज के प्रति युवाओं में भारी गुस्सा है, जिसका इजहार इस चुनाव में देखने को मिल सकता है। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मायावती की पार्टी बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की अटकलों को पहले ही खारिज कर दिया है, किंतु भाजपा और बसपा गठबंधन की संभावनाओं के बारे में प्रदेश की गलियों, चौराहों और नुक्कड़ों पर खूब चर्चा हो रही है। हर चुनाव में कहा जाता है कि राजनीति लीक बदल रही है, लेकिन हर बार प्रदेश की राजनीति अपने पुराने जातिवादी और अवसरवादी रूप में सामने आती है। लेकिन अब मतदाता काफी जागरूक हो चुका है, जिसे खाली घोषणाओं का लॉलीपाप दिखाकर ठगने का दौर खत्म हो चुका है। कौन सी पार्टी मतदाताओं का भरोसा जीतने में कामयाब होती है, यह तो नतीजों की घोषणा के बाद ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल जाति और वंशवाद के सहारे पार्टियां चुनावी मंझधार पार करने की जुगत में लगी हैं।

अप्रैल 01, 2013

नवसृजन की तैयारी का त्योहार है होली


खुशी, प्रेम, सौहार्द, नयापन और उत्साह होली का मूल भाव है, जिसे बचाए रखने की जरूरत है, नहीं तो इसके रंग फीके पड़ जाते हैं। 
पर्व-त्योहार किसी भी देश की समृद्ध परंपरा के वाहक होते हैं। हमारा देश सदियों से ही उत्‍सवों और त्‍योहारों की भूमि रहा है। यहां कभी होली, तो कभी दिवाली और कभी ईद, तो कभी बैसाखी मनाई जाती है। परंतु विगत कुछ दशकों से इन पारंपरिक उत्सवों के रंग फीके पड़ते दिख रहे हैं। होली की ही बात करें, तो हाल के वर्षों में इसके मनाने के तरीकों में काफी गिरावट देखी गई है।
होली जहां सामाजिकता और धार्मिकता से जुड़ी है, वहीं यह रंगों का त्‍योहार भी है। यह एक ऐसा सरस पर्व है, जो आनंद के उत्‍सव के रूप में मनाया जाता है। समाज का हर वर्ग इसे बहुत ही उत्‍साह के साथ मनाता है। इसमें जातिभेद-वर्णभेद का कोई स्‍थान नहीं होता। वास्‍तव में होली समाज की सामूहिक संस्कृति का परिचायक है। फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्‍योहार दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन लोग रात को लकड़ियों तथा कंडों का ढेर लगाकर होलिका पूजन और दहन करते हैं। इस दिन होली जलाकर लोग आपसी दुश्मनी एवं बैर को भुलाकर सौहार्द एवं सद्भाव के साथ रहने का संकल्प लेते हैं। अगले दिन रंग-गुलाल लगाकर एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं। होली बुरी प्रवृत्तियों पर अच्छाइयों की जीत का पर्व है, लेकिन आज होली के त्योहार में बुराइयां ही हावी होती दिख रही हैं।
हाल के दशकों में जिस तरह से हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी गई है, उसी तरह लोग अपनी परंपराओं एवं पर्वों के मूल स्वरूप को भुलाकर उन्‍हें विकृत ढंग से मनाने लगे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले जो हमें अपनी समृद्ध परंपराओं से पारस्‍परिक सौहार्द और सामाजिक समरसता बढ़ाने में मिलती थी, वह समाप्त होने लगा। इस बाजारवादी दौर में लोगों में लाभ कमाने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ी है कि लोग त्योहारों के अवसर पर मिलावट करने से भी बाज नहीं आते। इसका सबसे बुरा असर होली के त्योहार पर पड़ता है। मिठाई में मिलावट तो जगजाहिर बात है, लेकिन रंगों एवं गुलाल में भी मिलावट होने लगी है, जिसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। मुझे याद आते हैं बचपन के वे दिन, जब होली आने से एक महीने पहले से ही घरों में इसकी तैयारियां शुरू हो जाती थीं। होली में जमकर गुझिया और चिप्‍स-पापड़ उड़ाए जाते थे। लेकिन आज ये सारी तैयारियां बाजार में खो गई हैं। सबकुछ बाजार से तैयार आता है। लोगों की इसी मनोवृत्ति का लाभ बाजार के बनिए उठाते हैं। प्राकृतिक रंगों की जगह जहरीले रसायन युक्‍त रंगों ने ले ली है। इसके अलावा कीचड़, धूल और अन्‍य कई तरह की चीजों का उपयोग होली पर किया जाने लगा। इसके चलते न केवल लाखों लीटर पानी की बर्बादी होती है, बल्कि झगड़े एवं खून-खराबे की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। इतना ही नहीं, लोग भांग एवं शराब का सेवन कर इस पर्व की मूल मर्यादा को ही भूल जाते हैं और महिलाओं के साथ बदतमीजी करने से भी बाज नहीं आते।
हमारे गांव की एक परंपरा याद है मुझे, लोग रंग खेलने के बाद शाम को एक-दूसरे के घर जाकर पुरानी रंजिश भुलाकर गले मिलते थे। यह परंपरा भी धीरे-धीरे लुप्‍त हो चली है। आज लोगों के पास सामाजिक रिश्तों के लिए समय ही नहीं बचा है। आज तो लोग इस दिन को लोग पुरानी दुश्‍मनी का बदला चुकाने के लिए चुनते हैं। समझदारी के अभाव के चलते होली का स्‍वरूप विकृत हो चला है और सदियों से चली आ रही समृद्ध परंपरा खत्म होती दिख रही है।
होली ऐसे समय आती है, जब कंपकपाती ठंड विदा हो चुकी होती है, खेतों में नई फसल पकने वाली होती है। पतझड़ के बाद धरती हरियाली की नई चादर ओढ़ लेती है। ऐसा लगता है, मानो नवसृजन की तैयारियां चल रही हों, जिंदगी अपने सारे राग-रंग लेकर नाचने को आतुर हो। यही है होली का मूलभाव। खुशी, प्रेम, नयापन, हंसी और पारस्‍परिक सौहार्द। इस मूल भाव को बचाने की जरूरत है। लुप्‍त होती परंपरा को बचाने की जरूरत है। अगर इस पर्व को समझदारी से मनाया जाए, तो लोक कल्याण का साधन बनाया जा सकता है। 
काम्‍पेक्‍ट अमर उजाला में 27 मार्च को होली पर्व पर प्रकाशित आलेख का लिंक-
http://compepaper.amarujala.com/pdf/2013/03/27/20130327a_012105.pdf

फ़रवरी 12, 2013

भावों और संस्कृतियों के संगम में


बारह वर्षों के इंतजार के बाद आने वाला कुंभ देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोगों के लिए एक चमत्कार सरीखा है। हर कुंभ में देश-विदेश के करोड़ों लोग पहुंचते हैं और पतित-पावनी नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। महीनों चलने वाले इस आयोजन का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही, यह पर्यटन एवं व्यापार को भी बढ़ावा देता है। लेकिन अफसोस कि यह विशाल आयोजन मात्र प्रदर्शन का मंच बनकर रह गया है। शाही स्‍नानों पर संतों के अखाड़ों की अपार संपदा और आम जनता की आस्‍था का प्रदर्शन, बस इन्हीं दो पहलुओं के इर्द-गिर्द कुंभ के महापर्व की कहानी सिमटकर रह गई है।
हमारे देश में पुरुषार्थ चतुष्टय के तहत धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की महत्ता का वर्णन किया गया है। पुरुष चतुष्टय का यह धर्म मानवधर्म है, युगधर्म है। लेकिन सवाल उठता है कि कुंभनगरी में पधारने वाले हमारे संत-महात्मा, जो तेन त्यक्तेन भुंजीथा का जाप करते हैं, वे अपनी अपार धन-संपदा का प्रदर्शन करके क्या जताना चाहते हैं। जिस देश में करोड़ों लोग भूख एवं कुपोषण से मर जाते हैं, वहां संतों द्वारा शिष्यों से प्राप्त अकूत धन-संपत्ति के प्रदर्शन का क्या मतलब है!
यह सवाल भी मन में उठता है कि जब देश जल रहा होता है, तब धर्म को बचाने का दावा करने वाले हमारे संत-महात्‍मा चुप क्‍यों बैठे रहते हैं? पिछले दिसंबर में दिल्‍ली में घटी घटना की निंदा देश ही नहीं, दुनिया भर में हुई, लेकिन हमारे संत-महात्माओं की चुप्पी नहीं टूटी। हमारे संत-महात्माओं को भी देश-काल की समस्याओं के प्रति सकारात्मक एवं प्रगतिशील रवैया अपनाना चाहिए।
इसके अलावा, जब आम अमावस्‍या या पूर्णिमा के दिन होने वाला छोटा स्नान नदियों को इतना अधिक गंदा कर जाता है, तो कुंभ के विशाल आयोजन के दौरान नदियों की क्या स्थिति होती होगी। गंगा को बचाने की बात करने वाले साधु-संत क्या इसे पवित्र रखने में योगदान नहीं दे सकते? अगर साधु-संत सोच लें कि देश की जीवनरेखा गंगा नदी को पवित्र रखना है और उसके लिए सभी योजना बनाकर सफाई अभियान में लग जाएं, तो वह दिन दूर नहीं, जब गंगा पहले की तरह पवित्र और निर्मल हो जाएगी। पर ऐसा न होते देख लगता है कि देश आस्‍था व दिखावे के नाम पर लुट रहा है। दुखद है कि भारतीय संस्‍कृति का यह ऐतिहासिक आयोजन कुंभ धीरे-धीरे इसी लूट का जरिया बनता जा रहा है।
लेकिन यह समझ लेना भी जरूरी है कि कुंभ दिखावा, ढोंग, वैभव या आस्‍था का आडंबरी प्रदर्शन मात्र नहीं है। यह मोक्ष की कामना भर भी नहीं है कि अमृत कलश की दो बूंदंे हमें भी अमरत्व प्रदान कर देंगी। कुंभ के मूल मे छिपी है, भारतीय संस्‍कृति की विश्‍वविजयी अभियान की चिर गाथा, जिसके बूते हमारा देश विश्‍व गुरु कहलाया। एक वह दौर भी था, जब हमारे संतों ने देश की राजनीति को नई दिशा देकर इतिहास की नई इबारत लिखी थी। चाहे चाणक्‍य जैसे संत का सम्राट चंद्रगुप्‍त का मार्गदर्शन करना हो, या संत रामदास जैसे गुरु का शिवाजी को तैयार करना, हर जगह धर्म और संस्‍कृति ही मूल में विद्यमान थी। कुंभ के अवसर पर संतों को देश को नई दिशा देने का संकल्प लेना चाहिए।
आज के संतों और महात्‍माओं को भी चाहिए कि दिखावे से ऊपर उठकर भारतीय संस्‍कृति की मूल विचारधारा से जुड़ें, ताकि देश को नई दिशा देकर मौजूदा समस्याओं से निजात दिला सकें। भुखमरी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्‍टाचार, व्‍यभिचार और दुराचार जैसी समस्‍याओं के समाधान का अमृत यदि हमारा धर्मतंत्र छलकाने लगे, तो हमारे देश को फिर से जगद्गुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता। कुंभ संस्‍कृतियों, विचारों और भावों का संगम है। यह एक ऐसा मंच है, जहां से देश की समस्‍याओं के निदान की बात उठे, जहां से क्रांति के सुर फूटे और संपूर्ण विश्‍व-वसुधा को शांति के रंग में रंग दे। अगर ऐसा होगा, तभी कुंभ के आयोजन की सार्थकता दिखेगी। जिस नदी के पानी में स्नान कर हम अपनी आत्मा को पवित्र करने का एहसास पाते हैं, उसे पवित्र रखना भी हम सबका कर्तव्य है।

11/02/2013 के कम्‍पेक्‍ट में छपा हमारा आलेख पढ़ें।

http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20130211a_012108007&ileft=300&itop=71&zoomRatio=158&AN=20130211a_012108007

दिसंबर 17, 2012

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अक्टूबर 08, 2012

समग्र विकास से ही खुशहाली संभव


यह उदारीकरण का ही कमाल है कि एक तरफ जहां देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, वहीं गरीबों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है।
देश भर में पिछले कई वर्षों से विकास की चर्चा जोरों पर है। परंतु जब भी विकास की बात होती है, हर बार अमेरिकी मॉडल को ही अपनाने पर जोर दिया जाता है। हमारे देश के प्राकृतिक एवं विशाल मानव संसाधनों को ध्यान में रखकर कोई ठोस नीति नहीं बनाई जा रही, ताकि बेरोजगारी भी खत्म हो और खुशहाली भी आए। हमारे देश में उदारीकरण के दो दशकों के दौरान कैसा विकास हुआ है, उसकी असलियत ग्रामीण इलाकों में जाकर ही पता चलती है। मानव विकास सूचकांक एवं कुपोषण के मामले में हमारे देश की मौजूदा हालत सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। ग्रामीण इलाकों में बेशक मनरेगा जैसी कुछ योजनाओं के चलते चंद लोगों को रोजगार मिला है, लेकिन वह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है और भूख और बेरोजगारी को पूरी तरह खत्म करने में असमर्थ है।
हमारे यहां वास्‍तविक विकास तभी संभव हो पाएगा, जब देश के अंतिम व्‍यक्ति का हित सर्वोपरि रहे। यहां ऐसी नीतियों की जरूरत है, जिसमें देश के उस वर्ग का हित समाहित हो, जो देश का पेट भरने के लिए अनाज पैदा करता है। आज स्थिति यह है कि किसानों की जमीन छीनकर उद्योगपतियों को दी जा रही है। नतीजतन हमारा देश दो हिस्‍सों में बंट गया है। एक है, ऊंचे-ऊंचे मॉल, बड़ी-बड़ी इमारतें, शानो-शौकत और आधुनिकता से परिपूर्ण जीवन शैली वाला इंडिया, तो दूसरा है दीन-हीन भारत, जहां विवश किसान, गरीब मजदूर, उत्पीड़न के शिकार दलित, भूमि और आजीविका से बेदखल जनजातियां और शहरों की गलियों में भीख मांगते छोटे-छोटे बच्चे नजर आते हैं।
ऐसा नहीं है कि विकास की हमारी अपनी कोई नीति नहीं रही है। हमारी भारतीय संस्‍कृति में साथ-साथ रहने, खाने, जीने और आगे बढ़ने की शिक्षाएं दी जाती हैं। यानी विकास हो तो सभी के हित और सुख के लिए, न कि केवल कुछ खास लोगों और वर्गों के लिए। विकास के इस मॉडल में व्‍यक्ति के शारीरिक, मानसिक, आध्‍यात्मिक और सामाजिक विकास की अवधारणा समाहित है। लेकिन उदारीकरण के बाद के वर्षों पर नजर डाले, तो साफ महसूस होता है कि देश की इस विशेषता को लगातार खत्म करने की कोशिशें जारी हैं। बाजारवाद और वैश्‍वीकरण ने हमारे विचार, व्‍यवस्‍था और व्‍यवहार, तीनों में व्यापक परिवर्तन लाने की चेष्‍टा की। वर्तमान में लंबी-चौड़ी सड़कें, विशाल मॉल, एफडीआई से आने वाले धन, बढ़ती जीडीपी को ही विकास का मानदंड समझ लिया गया है। असल वात तो यह है कि सत्ता में बैठे लोग इसी को विकास मनवाने पर तुले हैं। परंतु यह टिकाऊ और संतुलित विकास नहीं है। असली विकास तो तब होता, जब चारों-ओर खुशहाली का माहौल होता और हर किसी के चेहरे की मुस्‍कान विकास का गुणगान करती दिखाई देती। शेयर बाजार का उछलना और विदेशी मुद्रा भंडार का बढ़ना विकास नहीं है।
अगर सरकार की ही बातों पर गौर करें, तो देश की लगभग 80 करोड़ जनता 20 रुपये रोजना पर गुजारा करती है। आखिर ऐसा क्यों है कि एक तरफ देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है, दूसरी तरफ गरीबों की संख्या में भी लगातार इजाफा होता जा रहा है। दरअसल यहां जो भी नीतियां बनाई जाती हैं, वे पूंजीपतियों एवं प्रभावशाली समूहों के हितों को ध्‍यान रखकर। यही वजह है कि आज आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी हुई है। इस खाई को पाटने के लिए एक समग्र विकास ढांचे की जरूरत है, जिसमें समाज के हर वर्ग को तवज्जो मिले और आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ देश की संस्कृति का भी खयाल रखा जाए। पहले व्‍यक्ति निर्माण, फिर परिवार निर्माण और उसके बाद समाज निर्माण के संकल्‍प के साथ जब आगे बढ़ा जाएगा, तभी राष्‍ट्र का निर्माण संभव है। इसके बाद ही वह दौर आएगा, जब विकास की बूंद उस अंतिम व्‍यक्ति तक पहुंचेगी, जो आम आदमी के नाम से जाना जाता है।
 8 अक्‍टूबर 2012 के अमर उजाला कांम्‍पेक्‍ट में  विकास के समग्र मॉडल पर चर्चा करता आलेख पढ़ें  http://compepaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20121008a_012108004&ileft=294&itop=67&zoomRatio=158&AN=20121008a_012108004